आखिर क्‍यों इतना खूनी है पश्चिम बंगाल में मतदान, क्‍या हैं इसके सियासी मायने

विरोधाभास देखिए कि इतने हिंसक चुनावों के बाद भी औसतन 80 फीसदी की बंपर वोटिंग भी पश्चिम बंगाल में ही हुई। क्‍या ये दोनों बातें एकसाथ आसानी से गले उतरती हैं?

आखिर क्‍यों इतना खूनी है पश्चिम बंगाल में मतदान, क्‍या हैं इसके सियासी मायने

ममता बनर्जी रैली करने के लिए पीएम मोदी, बीजेपी राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह, स्‍टार प्रचारक योगी आदित्‍यनाथ का हैलीकॉप्‍टर अपने प्रदेश में उतरने नहीं दे रहीं। चुनाव का आगे बढ़ता हर चरण पहले से ज्‍यादा हिंसक होता जा रहा। तीसरे चरण में तो बीजेपी के एक कार्यकर्ता की हत्‍या कर दी गई। एक वीडियो आया है, जिसमें छठवें चरण की वोटिंग से पहले बीजेपी द्वारा लगाए गए होर्डिंग्‍स को म्‍युनिसिपल कॉरपोरेशन के कर्मचारी निकाल रहे हैं। मतदान के दौरान बीजेपी के उम्‍मीदवारों (बाबुल सुप्रियो, भारती घोष) और अन्‍य विपक्षी दलों के उम्‍मीदवारों पर भी हमले हुए। पिछले साल हुए पंचायत के चुनावों में कई सीटों पर तो कोई भी विपक्षी उम्‍मीदवार नामांकन तक दाखिल नहीं कर पाया।

 

ये सब स्थितियां साफ तौर पर दर्शाती हैं कि ममता, मोदी को केवल खुली चुनौती नहीं दे रही हैं बल्कि अपने आधिपत्‍य वाले इस राज्‍य पर पड़ रही किसी अन्‍य की तिरछी नजर को भी बर्दाश्‍त नहीं कर पा रही हैं। बीजेपी भले ही यहां अपनी जड़ें जमाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है लेकिन ममता, बीजेपी समेत हर विपक्षी दल की जड़ें उखाड़ने के लिए हर तरीका आजमा रहीं हैं। एक पल के लिए सोचिए कि क्‍या ममता की हर कीमत पर (चाहे लोकतंत्र के इस महापर्व में सबसे हिंसक चुनावों का नफरत भरा ताज पश्चिम बंगाल के सिर पर पहनाया जाए)  जीतने की ये कोशिश उस जैसी ही नहीं है, जिसके लिए ममता, पीएम मोदी को कोसती रही हैं।  

 

लेकिन क्‍या इतना सब करके भी ममता अपने मतदाताओं के बीच वो छवि कायम रख पाईं हैं जिसके दम पर वो इस राज्‍य की मुख्‍यमंत्री बनने के बाद अब प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रही हैं। ऐसा नहीं है कि ममता ने काम नहीं किया, उन्‍होंने कामगारों के लिए जो योजनाएं चलाईं, उससे उन्‍हें लंबा फायदा होगा। फिर भी मतदाता केवल ये योजनाएं ही तो नहीं देखते जो केवल एक वर्ग विशेष को ही फायदा दें।

 

ममता की ही सीट भवानीपुर के मतदाता अरिंदम दत्‍ता जो कि तब से ही ममता को वोट दे रहे हैं, जब से ममता ने चुनाव लड़ना शुरू किया था। कहते हैं कि ममता अगर बनर्जी बनी रहती हैं तो सब ठीक रहता है लेकिन जब वो बानो बनने लगती हैं तो मामला उलट जाता है। उनका साफ मतलब ममता की तुष्टीकरण की नीति और बांग्लादेशियों के प्रति उदार रवैये से है, जो उनके बंगाली मतदाताओं को रास नहीं आती। बंगाली ही क्‍यों बात पूरे हिन्‍दू मतदाताओं की करें तो उन्‍हें भी ये बात नहीं पचती कि ममता मुस्लिम वोट पाने के लिए इस कदर लालायित रहें। जबकि करीब 10 करोड़ की आबादी वाले पं. बंगाल में हिन्दुओं की हिस्सेदारी 70.54 और मुसलमानों की 27.01 है। अन्य लगभग नगण्य हैं।

 

ऐसे में उनके पास एक ही विकल्‍प बचता है कि या तो वे ममता के इस मुस्लिम प्रेम के आगे झुक जाएं और बिना सवाल उठाए, विरोध किए उन्‍हें वोट देते रहें। भले ही उनके अंदर ये कसक सालती रहे कि वे ऐसी ममता को नहीं चाहते हैं या फिर हिन्‍दुत्‍व की ध्‍वजा लेकर आई बीजेपी को वोट दे दें। बस, मतदाताओं के इसी अंतर्द्वंद का फायदा बीजेपी को मिला है, जिसके कारण वो पश्चिम बंगाल में लगातार मजबूत हो रही है। वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मात्र 4 फीसदी वोट मिले थे लेकिन वर्ष 2018 के पंचायत चुनाव के बाद भगवा पार्टी अचानक मुख्‍य विपक्षी पार्टी बन गई। जमीनी स्‍तर से आ रही रिपोर्टों के मुताबिक इस बार बीजेपी का वोट शेयर 16 प्रतिशत के मुकाबले दोगुना हो सकता है।

 

 

जाहिर है ममता बनर्जी के गढ़ में जैसे-जैसे ये बात हर बीतते चरण के साथ सामने आ रही है कि वैसे राज्‍य में सत्‍ताधारी टीएमसी और विपक्षी बीजेपी के बीच हिंसा और धमकी देने की घटनाएं तेज हो गई हैं। पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो राहुल वर्मा कहते हैं कि हिंसा के पीछे महत्‍वपूर्ण राजनीतिक संकेत छिपा हुआ है, हिंसा राज्‍य में राजनीतिक बदलाव लेकर आती है। ये उस बौखलाहट को भी दर्शाती है कि तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल से वामदलों को सत्‍ता से उखाड़ फेंकने के बाद पहली बार कड़े प्रतिरोध का सामना कर रही है।

 

बीजेपी को हटा दें तो पश्चिम बंगाल में वर्ष 1977 से लेकर 2011 तक शासन करने वाले वामदल राज्‍य की राजनीति में अपना जनाधार खोते जा रहे हैं। वर्ष 2011 में जहां उन्‍हें 40 फीसदी वोट मिले थे वहीं, 2016 में उन्‍हें मात्र 25 प्रतिशत वोट मिले थे। लेफ्ट के पतन से जिस तरह पहले टीएमसी को फायदा हुआ वहीं अब टीएमसी का नुकसान बीजेपी के फायदे में बदल रहा है।

 

वैसे बंगाल में चुनावी हिंसा की शुरूआत तो इन वर्षों से पहले ही हो चुकी थी, जिनका जिक्र ऊपर किया गया है। हिंसा का इतिहास यहां 60 के दशक से शुरू होता है। जिनके पीछे के कारण राज्‍य में बढ़ती बेरोजगारी, विधि शासन पर सत्‍ताधारी दल का वर्चस्‍व आदि गिनाए जाते हैं।  केवल 1977 से 2007 तक (लेफ्ट फ्रंट की सत्ता) के बीच ही यहां 28,000 राजनीतिक हत्याएं हुई थीं। सिंगूर और नंदीग्राम के हिंसात्‍मक आंदोलन के अलावा भी यहां ढेरों ऐसी घटनाएं हुईं हैं जो रिपोर्ट ही नहीं हुईं।  

 

तो क्‍या इतनी हिंसा के बीच हो रही इस बंपर वोटिंग को सामान्‍य मान लिया जाए? नहीं, क्‍योंकि जमीनी हकीकत इसे आसानी से गले नहीं उतरने देती। 11 अप्रेल को पहले चरण के चुनाव में बंगाल में पैरामिलिट्री बलों की 83 कंपनियां तैनात की गईं थीं। जबकि पांचवें चरण के मतदान के लिए इनकी संख्‍या बढ़कर 770 कंपनियों की तैनाती पर पहुंच गई। चुनाव में सुरक्षा बलों को देखकर लोगों का आत्मविश्वास बढ़ता है, लेकिन क्या ये सुरक्षा बल मतदान में होने वाली गड़बड़ी को रोक सकते हैं? जाहिर है एकदम नहीं। क्‍योंकि बंगाल देश में अकेला ऐसा राज्य है जहां विपक्षी दलों को वोट करने वाले डरे हुए हैं जिसके कारण कई इलाकों में लोग मतदान के लिए घर से बाहर ही नहीं निकल रहे।

 

कोलकाता में तो ऐसा नहीं है लेकिन ग्रामीण इलाकों में यह आम बात है। मतदाता के न आने पर सत्ताधारी दल के ‘दादा’ प्रकट होते हैं और बूथ पर तैनात राज्य के सरकारी कर्मचारियों से सांठगांठ करके अपने लोगों से वोट डलवा देते हैं। बूथ के बाहर तैनात सुरक्षा बलों को इसका पता भी नहीं चलता, क्योंकि वे स्थानीय लोगों को जानते ही नहीं हैं। सत्‍ताधारी दल के लोग विपक्षी दलों के बूथ एजेंटों को डराकर भगा देते हैं या फिर डमी प्रत्याशियों के एजेंटों के साथ मिलकर उस पर हावी हो जाते हैं। लिहाजा सिर्फ केंद्रीय बलों की तैनाती से ही निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते। हालांकि ऐसा कुछ चुने हुए बूथों पर ही किया जाता है। फिर भी फर्जी मतदान तो फर्जी ही है!

 

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