क्या यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा से अपने आंसू का हिसाब लेंगे राकेश टिकैत?

एक साल पहले तक दिग्गज किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र के रूप पहचाने जाने वाले राकेश टिकैत आज देश के सबसे बड़े किसान नेता के तौर पर अपनी पहचाने जा रहे

क्या यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा से अपने आंसू का हिसाब लेंगे राकेश टिकैत?
Desh 24X7
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November 3,2021 09:50

साल के आरंभ में खूब सुर्खियां बटोर चुके कृषि कानूनों की किस्मत महज कौतूहल का विषय बनकर रह गई है। मगर, कृषि कानून के विरोध में चल रहे आंदोलन की वजह से लगातार सुर्खियों में बने हुए किसान नेता राकेश टिकैत की किस्मत जरूर चमक गई है।  एक साल पहले तक राकेश टिकैत की पहचान दिग्गज किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र के रूप में होती थी। मगर, राकेश टिकैत ने आज देश के सबसे बड़े किसान नेता के तौर पर अपनी पहचान बना ली है और वह  खम ठोक कर भाजपा नीत केंद्र सरकार को चुनौती देते हैं। किसान आंदोलन से जुड़े दूसरे नेता भी उनकी ही लाइन पर और उनकी ही भाषा बोलते हैं। 

 

 

देश की राजनीति को बेहतर तरीके समझने वाले भी अब मानने लगे हैं कि भले ही पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर किसान आंदोलन का कोई बड़ा असर नहीं पड़ा, लेकिन 2022 में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब विधानसभा चुनावों में किसानों के मुद्दे काफी अहम होंगे। जाहिर है कि इन तीनों सूबों के किसान कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे आंदोलन में सक्रिय रहे हैं। जानकार बताते हैं कि राकेश टिकैत हालांकि अपने पिता की तरह जमीनी तौर पर किसान नेता नहीं बन पाए हैं, लेकिन आंदोलन के दौरान उन्होंने जितनी सुर्खियां बटोरी हैं उससे लगता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विधानसभा की कम से कम 40 से 50 सीटों पर वह असर डाल सकते हैं।

 

 

 टिकैत को विपक्षी दलों का मोहरा करार देने वाले भी दबी जुबान में इस बात को स्वीकार करते हैं। आंदोलन के विरोधी खेमे के एक किसान नेता ने कहा कि राकेश टिकैत भले ही खुद को जाटलैंड के सरताज कह लें, लेकिन बतौर आजाद प्रत्याशी वह अपने बलबूते जाट बहुल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसी भी सीट से चुनाव नहीं जीत सकते हैं। हालांकि वह इस बात को स्वीकार करते हैं कि किसानों के मुद्दों को उभारकर वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव में नुकसान जरूर पहुंचाएंगे। 

 

 

राकेश टिकैत एक बार विधानसभा और एक बार लोकसभा चुनाव में अपना भाग्य आजमा चुके हैं, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। लेकिन, जानकार बताते हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव अगर वह लड़ने का फैसला लेते हैं तो विपक्षी दलों का पूर्ण समर्थन मिल सकता है जिससे वह विधायक जरूर बन सकते हैं। भारतीय किसान यूनियन भाकियू के एक नेता ने कहा कि राकेश टिकैत के आंसू को लोग याद रखेंगे और चुनावों में भाजपा से उसका बदला लेंगे। 

 

 

दरअसल, दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर से आंदोलनकारी किसानों को हटाने के लिए 28 जनवरी 2021 को जब पुलिस-प्रशासन ने सख्ती दिखाई तो राकेश टिकैत वहां से नहीं हटने का एलान करते हुए रो पड़े थे। यह देख पश्चिमी उत्तर प्रदेश और आसपास के किसान भारी तादाद में वहां जुट गए जिसके बाद प्रशासन गाजीपुर बॉर्डर खाली करवाने से विफल रहे। किसान आंदोलन का यह टर्निंग प्वाइंट था जब आंदोलन को खुले तौर पर समर्थन देने के लिए विपक्षी दलों के नेता धरना-स्थल पर पहुंचने लगे थे।

 

 

  देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के धरना-प्रदर्शन को एक साल पूरा होने जा रहा है। नये केंद्रीय कानूनों की वापसी की मांग को लेकर पिछले साल 26 नवंबर 2020 को पंजाब, हरियाणा और आसपास के इलाकों से दिल्ली की तरफ कूच करने वाले आंदोलनकारी किसानों का धरना-प्रदर्शन राष्ट्रीय राजधानी की सीमाओं लगातार चल रहा है। वे नये कृषि कानूनों को निरस्त करने की अपनी मांगों पर अड़े हैं।    

 

 

राकेश टिकैत ने एक दिन पहले एक ट्वीट के जरिए कहा, ’’केंद्र सरकार को 26 नवंबर तक का समय है, उसके बाद 27 नवंबर से किसान गांवों से ट्रैक्टरों से दिल्ली के चारों तरफ आंदोलन स्थलों पर बॉर्डर पर पहुंचेगा और पक्की किलेबंदी के साथ आंदोलन और आन्दोलन स्थल पर तंबूओं को मजबूत करेगा।’’कोरोना काल में 5 जून 2020 को केंद्र सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से तीन नये कृषि कानून लागू किए जिनके लिए आगे संसद में लागे गए विधेयकों को 20 सितंबर, 2020 को संसद की भी मंजूरी मिल गई।

 

ये कानून हैं- 1. कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून 2020, 2. मूल्य आश्वासन पर किसान समझौता (अधिकार प्रदान करना और सुरक्षा) और कृषि सेवा कानून 2020 3. आवश्यक वस्तु संशोधन कानून 2020

 

 

इन कानूनों के विरोध में किसानों का आंदोलन जोर पकड़ने पर सरकार और आंदोलनकारी किसान यूनियनों के नेताओं के साथ कई दौर की वार्ताएं र्हुइं, लेकिन कानूनों को निरस्त करने की मांग पर सहमति नहीं बन पाई। इस बीच, आंदोलन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के बाद 12 जनवरी 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने तीनों विवादास्पद कृषि कानूनों के अमल पर रोक लगाते हुए इनके संबंध में हितधारकों की राय जानने के लिए एक कमेटी बना दी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट सर्वोच्च अदालत को सौंप दी है। मगर, इस पर अब तक कोई फैसला नहीं आया है।

 

 

इन कानूनों को निरस्त करने के अलावा किसानों की एक बड़ी मांग है फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी के लिए नया कानून। किसान चाहते हैं कि उनको एमएसपी पर फसल बेचने की कानूनी गारंटी मिले।

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