जरूरी है बना रहे शिक्षकों का उत्साह

नहीं तो संसाधनों की कमी से गधे बन जाते हैं रेस के घोड़े

जरूरी है बना रहे शिक्षकों का उत्साह

भीमताल से पिथौरागढ़ के रास्ते में जगह-जगह खूबसूरत बुरांस के पेड़ (जो उत्तराखंड का राजकीय फूल भी है) देखने को मिलते थे। उत्तराखंड के मेरे सहकर्मी इसके फूलों के अनेक गुणों का बखान कर रहे थे। उन्होंने यह भी बताया कि इस फूल का रस कितना उपयोगी और स्वादिष्ट होता है। अभी पिछले ही हफ्ते मैंने राजस्थान के बाड़मेर जिले में वहां के रंग-बिरंगे राजकीय फूल रोहिड़ा को देखा। तब राजस्थान के मेरे सहकर्मी, जो उत्तराखंड के ही निवासी हैं, उन्होंने मुझे याद दिलाया था कि अगले ही हफ्ते जब मैं उत्तराखंड जाऊंगा तो वहां खूब सारे बुरांस के फूल देखने को मिलेंगे। यह खयाल आते ही मैंने बुरांस के फूलों की कुछ तस्वीरें राजस्थान के उस सहकर्मी को भेज दीं ।

 

 

 

 

 

कुछेक जगहों को छोड़कर, जहां रखरखाव का काम चल रहा था, आमतौर पर सड़कों की हालत बहुत अच्छी थी। हालांकि कहीं-कहीं वे बेहद संकरी और खतरनाक भी हो जाती थीं। मैं जब भी पहाड़ों पर यात्रा करता हूं तो यह सोचता हूं कि बार-बार होने वाले भूस्खलनों, बारिश और अनिश्चित मौसम की भारी चुनौतियों के बावजूद, आखिर ‘सीमा सड़क संगठन’ (बीआरओ) इन सड़कों का इतना अच्छा रखरखाव कैसे कर पाता है। लगभग ढाई घंटे की कठिन यात्रा के बाद मेरे सहकर्मी को अचानक हमारे टीम के एक सदस्य की मोटरसाइकिल उनके एक परिचित स्कूल के बाहर खड़ी दिखाई दी। उन्होंने उनको फ़ोन करके पूछा कि क्या वे वाकई वहीं हैं। उनके मोबाइल पर स्कूल की कक्षा की कुछ तस्वीरें देखने के बाद हम थोड़ा हिचकते हुए ही उस स्कूल में जाने को तैयार हुए (क्योंकि पिथौरागढ़ के लिए देरी हो रही थी)। जिस चीज़ ने एकदम शुरू में ही मुझे प्रभावित किया वह थी स्कूल की अद्भुत प्राकृतिक छटा और उसके गेट पर लिखा यह नारा – “शिक्षार्थ प्रवेश – सेवार्थ प्रस्थान” (यानी शिक्षा के उद्देश्य से दाखिल हों और सेवा के उद्देश्य से बाहर जाएं)।

 

 

 

उस स्कूल की दो-अलग-अलग इमारते थीं – पहली इमारत उच्च प्राथमिक कक्षाओं की थी और दूसरी निम्न प्राथमिक कक्षाओं की। उस समय दोपहर के खाने का समय हुआ था और बच्चों ने खाना शुरू ही किया था। जब ये पूछा गया कि खाने में क्या था तो सबने एकसाथ बोला “दाल-भात”। जब हमने यह पूछा कि “दाल-चावल” और “दाल-भात” में क्या अंतर है तो तुरंत ही जवाब आया “चावल कच्चा होता है और पके चावल को भात कहते हैं”। उच्च और निम्न प्राथमिक दोनों ही स्तरों के बच्चे बड़े जोशीले, समझदार और बहुत हाजिरजवाब थे। शौचालय तो मेरे अब तक के देखे हुए सरकारी स्कूलों में से सबसे साफ शौचालयों में से एक थे। बेशक इसका श्रेय यहां के दो शिक्षक-शिक्षिकाओं को जाता था। निम्न प्राथमिक स्कूल की शिक्षिका यहां पिछले चार साल से पढ़ा रही थीं। उनके साथ हुई लम्बी बातचीत में बच्चों के साथ उनका गहरा जुड़ाव और अपने बच्चों को अलग तरह से विकसित होता देखने की उनकी जबरदस्त लालसा झलकती थी। कक्षाओं में लटकाई गई शिक्षण सामग्री और सहेजकर रखी गई विद्यार्थियों की नोटबुकों में दूसरे व तीसरे दर्जे के बच्चों का सधा हुआ अंग्रेजी लेखन सचमुच बेहद प्रभावशाली था। उस शिक्षिका की कड़ी मेहनत के बगैर यह संभव नहीं था। इसमें एक निराशा की बात बस यह थी कि वे अपना स्थानांतरण ऐसी जगह करवाना चाहती थीं जो उनके लिए थोड़ी सुविधाजनक हो और इस बात से वे दुखी थीं कि अपनी परेशानी दूर करने का कोई उपाय उनके पास नहीं था।

 

 

 

 

अगले दिन हमने पिथौरागढ़ से मुंसियारी की यात्रा की। उस दिन काफी बारिश हो रही थी जिससे ठंड भी बढ़ गई थी। “छोरीबगारी” नाम के इलाके में हमें उस जगह को ढूंढने में बड़ी मुश्किल हुई जहां पिथौरागढ़ जिले की हमारी टीम उस ब्लॉक के तीस से भी ज्यादा शिक्षक-शिक्षिकाओं के साथ एक कार्यशाला कर रही थी। वो मुख्य सड़क से लगभग 400 मीटर अंदर स्थित एक प्राथमिक स्कूल था और उसे ढूंढने के लिए हमें लगभग पांच किलोमीटर वापस लौटना पड़ा। तेज बारिश, दूरी और सर्द हवाओं के बावजूद वहां सत्ताइस शिक्षक-शिक्षिकाएं व ब्लॉक पदाधिकारी मौजूद थे। हम जब वहां पहुंचे तो वे कार्यशाला में अपने अनुभवों को संक्षेप में बता रहे थे। बारिश तेज हो चुकी थी लेकिन फिर भी मुझे किसी के भी चेहरे पर यह चिंता नहीं दिखी कि “हम वापस घर कैसे जाएंगे”। बल्कि वे अपनी बातचीत को ही आगे बढ़ाने के लिए तत्पर दिख रहे थे।    

 

 

 

मुंसियारी में हमारा स्वागत भारी बर्फबारी और शून्य से दो डिग्री नीचे के तापमान ने किया। चूंकि होटल में कमरा गर्म करने का कोई उपाय नहीं था इसलिए हाड़तोड़ ठंड से बचने के लिए हमने गर्मागर्म प्याज के पकौड़े झटपट खा लिए और कई प्याली अदरक वाली चाय भी पी ली। उस जिले में हमारी टीम के सदस्य अगले दिन की बैठक के लिए शिक्षक-शिक्षिकाओं से संपर्क करने में व्यस्त थे। बैठक 11 बजे शुरू होनी थी और ऐसा लगता था कि कार्यक्रम पर मौसम का कोई असर नहीं पड़ा था। हर चीज़ इसपर निर्भर कर रही थी कि उस रात कितनी बर्फबारी होगी। अगली सुबह यह खबर मिली कि पांच में तीन मुख्य सड़कें जिनसे शिक्षक-शिक्षिकाओं का आना था भारी बर्फबारी से बंद हो गई हैं।

 

 

 

तमाम मुश्किलों के बावजूद, लगभग पचास शिक्षक-शिक्षिकाएं व शिक्षा विभाग के पदाधिकारी नियत कमरे में मौजूद थे (65 के आने की योजना थी) और बातचीत निर्धारित समय से लगभग दस मिनट बाद शुरू हो गई। कई लोगों के वाट्सएप संदेश आए कि सड़कों के बंद होने के कारण वे नहीं आ पा रहे हैं। इसके बाद, बच्चों के साथ और स्कूलों में होने वाले विशिष्ट अनुभवों व चुनौतियों के बारे में बातचीत हुई। बातचीत का स्वर समाज के ज़िम्मेदार सदस्य बनने के लिए बच्चों के विकास में शिक्षक-शिक्षिकाओं की भूमिका के आसपास केन्द्रित था। ज्यादातर शिक्षक-शिक्षिकाओं ने पालकों का सहयोग हासिल करने में आने वाली कठिनाइयों की बात उठाई क्योंकि पालक या तो अपनी आजीविका कमाने में पूरी तरह उलझे हुए थे अथवा खुद निरक्षर होने के कारण वे बच्चों की शिक्षा में योगदान देने में अक्षम थे। 

 

 

 

किसी ने इस बात का ज़िक्र कर दिया कि मैं केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार मंडल (केब) का सदस्य हूं। कुछ शिक्षक-शिक्षिकाओं को लगा कि अपनी समस्याओं को उठाने और सरकारी नीतियों से जुड़े मुद्दों को समझने का यह उचित मंच है। पहला सवाल स्कूलों में शिक्षक-शिक्षिकाओं की कमी के चलते उनके सामने आने वाली समस्याओं के बारे में था। एक शिक्षक ने पूछा, “हम हर दर्जे के लिए अलग-अलग कक्षाएं और हर कक्षा के लिए अलग-अलग टीचर की अपेक्षा क्यों नहीं कर सकते”? दूसरा सवाल बच्चों के साथ सहभागितापूर्ण तरीके से काम करने के लिए पालकों के साथ मजबूत नेटवर्क बनाने के बारे में था। इसके अलावा वर्तमान शिक्षा में परीक्षाओं की केन्द्रीयता, फेल न करने की नीति से जुड़े मसले, सतत व व्यापक मूल्यांकन के लिए क्षमता निर्माण की भारी आवश्यकता आदि से जुड़े मुद्दों पर आमतौर पर होने वाली चर्चाएं ही हुईं। उनमें से कइयों ने मध्याह्न भोजन पर लगने वाले समय, बिना मतलब के सर्वेक्षणों और गैर-अकादमिक कामों की शिकायत की। उन्होंने खुद सरकार द्वारा की गई प्रतिबद्धताओं, नीतियों व कार्यक्रमों को लागू न किए जाने के मुद्दे उठाए। उनके ज्यादातर सवाल, स्पष्टीकरण और अप्रत्यक्ष मांगें बेहद प्रासंगिक थीं और उनसे कुछ बेहतर करने की उनकी प्रतिबद्धतता झलकती थी। केब का एक ज़िम्मेदार सदस्य होने के नाते मैने उनको सरकार की सीमाएं, शिक्षक शिक्षण की गुणवत्ता सुधारने के लिए किए जा रहे प्रयास, देशभर के सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने से जुड़े मुद्दों पर बनी विभिन्न कमेटियों आदि के बारे में समझाने की कोशिश की। हालांकि वे इन प्रयासों की तारीफ़ कर रहे थे, लेकिन उनको यह शंका हो रही थी कि जबतक सरकार शिक्षा के अपने बजट को लगभग दोगुना नहीं कर देती ये कार्यवाहियां भला कैसे होंगी।

 

 

 

इस हफ्ते के तीन परस्पर संवादों में से किसी में भी मुझे शिक्षक-शिक्षिकाओं और शिक्षा पदाधिकारियों में तमाम कठिनाइयों के बावजूद उत्साह की कोई कमी नहीं दिखी। और इतनी ऊर्जा व प्रतिबद्धता मैं पहली बार नहीं देख रहा था। कई मामलों में यह ज्यादातर संगठनों के आम अनुभवों से मेल खाता था – अधिकतर कर्मचारी संगठन में शामिल होते समय ‘रेस के घोड़े’ होते हैं – ऊर्जा से लबालब और कुछ बेहतर करके दिखाने के प्रति समर्पित; लेकिन संगठन में हावी नौकरशाही, प्रतिकूल स्थितियां, संसाधनों और मौकों की कमी उनको ‘गधा’ बना देती है। इसके अलावा, इस तरह की स्थितियों के बने रहने से उनकी उत्प्रेरणा पर प्रभाव पड़ता है और नकारात्मक माहौल बनता है।

 

 

 

यह सही है कि हमें सेवा-पूर्व शिक्षक शिक्षण, सेवारत शिक्षक विकास, शिक्षा बजट और शिक्षा के तमाम दूसरे मुद्दों को सुलझाना है, लेकिन हमें इस बात से खुशी मिलनी चाहिए कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में उत्साही शिक्षक-शिक्षिकाओं और शिक्षा पदाधिकारियों की कोई कमी नहीं है। सवाल यह है कि हम उनकी देखरेख किस तरह करें कि वे वाकई “रेस के घोड़े” बन सकें।

 

 

 

Pithoragarh Bhimtal