अभिमन्यु की तरह मोटर वाहन कानून के चक्रव्यूह में घिरे गडकरी

जिस मोटर वाहन कानून को जनविरोधी कहकर नितिन गडकरी को निशाने पर लिया जा रहा है, उसे बनाने में कौन-कौन, कब से, किस तरह की भूमिका का निर्वाह कर रहे थे।

अभिमन्यु की तरह मोटर वाहन कानून के चक्रव्यूह में घिरे गडकरी

राजनीति में जिस तरह स्थायी दोस्त और दुश्मन नहीं होते, ठीक उसी तरह दो और दो मिल कर चार भी नहीं होते। लेकिन कभी कभी दिग्गज नेता भी या तो यह समझने में चूक जाते हैं या फिर अपने लक्ष्य और काम में इतने अधिक मशगूल होते हैं कि इस तरफ उनका ध्यान ही नहीं जाता, बस सरपट भागे चले जाते हैं और ठोकर लगने पर ही अहसास होता है कि पहले इसका ख्याल क्यों नहीं किया।

 

मोदी सरकार में मेहनती और कार्यकुशलता के लिए चर्चित भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी भी कुछ इसी तरह की शख्सियत हैं, जो हवन करते हुए अपने हाथ जला बैठते हैं। नये मोटर वाहन कानून का उन्हें जो श्रेय दिया जाना चाहिए था, उसे दरकिनार कर उन्हें खलनायक पेंट करने में देश के सभी राजनैतिक दल जुट गए हैं, जिसमें भारतीय जनता पार्टी भी सम्मिलित है। एक बार मैंने भी इसी तरह समाज की चिंता में भावनावश होकर, अपने निजी स्वार्थों को किनारे रख, सामाजिक कार्य उत्साह से करने के लिए एक बड़े सामाजिक कार्यकर्ता से सलाह मांगी थी। उन्होंने कहा था कि समाज अपनी गति से आगे बढ़ता है, उसके साथ तालमेल कर आगे बढ़ो, समाजकार्य इसी तरह आगे बढ़ता है।

 

नये मोटर कानून का जो ठीकरा गडकरी के सिर पर फोड़ा जा रहा है, उसके लिए पूरा पक्ष-विपक्ष जिम्मेदार है। नये मोटर कानून को बनाने के लिए केन्द्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने राज्यों के यातायात मंत्रियों की एक समिति (GOM) बनाई थी। इस कमेटी की अध्यक्षता राजस्थान के उस समय के यातायात मंत्री यूनुस खान कर रहे थे और भारत के कुल 28 राज्यों में से 18 के यातायात मंत्री, जो विभिन्न राजनीतिक दलों से थे, इसके सदस्य थे।

 

इस समिति (GOM) की सिफारिशों को ध्यान में रखकर मोटर व्हैकिलस (संशोधन) बिल 2016 केन्द्रीय परिवहन मंत्रालय ने बनाया और इसे कुछ संशोधनों के साथ 10 अप्रैल 2017 को लोकसभा ने पास भी कर दिया। लोकसभा में पारित इस मोटर वाहन बिल को राज्यसभा में लाया गया, राज्यसभा ने इस बिल को 8 अगस्त 2017 को चयन समिति के हवाले कर दिया। चयन समिति ने अपनी रिपोर्ट 22 दिसंबर 2017 को संसद को सौंपी, यह राज्यसभा में ही लंबित रहा और 16वीं लोकसभा के अवसान के साथ समाप्त हो गया।

 

17वीं लोकसभा में इसे दोबारा लाने के लिए 24 जून 2019 को केन्द्रीय कैबिनेट के सामने मंजूरी के लिए रखा गया। मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस नये मोटर वाहन बिल को 15 जुलाई 2019 को लोकसभा में प्रस्तुत किया और यह बिल संसद में पारित होकर कानून बन गया।

 

यह सब विवरण देने की जरूरत इसलिए पड़ी कि जिस मोटर वाहन कानून को जनविरोधी कहकर नितिन गडकरी को निशाने पर लिया जा रहा है, उसे बनाने में कौन-कौन, कब से, किस तरह की भूमिका का निर्वाह कर रहे थे।

 

प्रश्न यह उठता है कि यदि भाजपा को भी इस बिल का विरोध करना था, तो विभिन्न चरणों में ही इसे क्यों नही रोका गया। यदि इसके कारण जन विरोध और विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में खतरा था, तो इसे लागू क्यों करवाया गया, संसद से पारित होने के बाद भी इसे लंबित ही क्यों, नहीं रहने दिया गया। नितिन गडकरी को खलनायक क्यों बनाया जा रहा है, जबकि भाजपा के पास इसे रोकने के कई मौके थे। नितिन गडकरी का पार्टी या सरकार स्तर पर कोई समर्थन करता क्यों नहीं दिख रहा है। उसे चक्रव्यूह में अभिमन्यु बनाकर घेरने के पीछे उद्देश्य क्या हैं।

वैसे नितिन गडकरी के साथ यह पहला अवसर नहीं है। वह वर्ष 2009 से 2013 तक भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। 2012 में ही उन्हें दोबारा भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की उठा पटक शुरू कर दी गई थी और इसके लिए भारतीय जनता पार्टी के संविधान में आवश्यक संशोधन भी कर दिया गया था, ताकि वह दोबारा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकें।

 

जनवरी 2013 में यह खबरें मीडिया की सुर्खियां बटोर रही थी कि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर एक बार फिर नितिन गडकरी को बैठाना तय हो गया था। पार्टी किसी और नेता पर पार्टी एकमत नहीं हो पाई थी और तमाम नेताओं के विरोध के बावजूद गडकरी का अध्यक्ष बनना अब लगभग निश्चित माना जा रहा था। उसी महीने के अंत में भाजपा अध्यक्ष का चुनाव होना था। उस समय खबरें यह भी मिली थी कि सुषमा स्वराज, मनोहर पर्रिकर, शांता कुमार और राजनाथ सिंह के नामों पर भी चर्चा हुई थी।

 

अंतिम निर्णय पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में लिया जाना था। लेकिन तभी पूर्ति और न जाने कौन-कौन से घोटाले उघाड़कर उनका खेल खराब कर दिया गया था। वैसे राजनीति के मैदान में सभी तरह के दांव-पेंच चलते हैं, इसमें असामान्य कुछ भी नहीं है, सभी नेता इस तरह के घटनाक्रमों में उलझते, निकलते रहते हैं। गडकरी जैसे मंजे हुए राजनेता के लिए भी यह अनपेक्षित नहीं है, लेकिन रुकावट तो आती ही है, आगे के लिए नसीहत भी मिलती है।

Gadkari MV Act BJP