कोविड-19 प्रतिरोधी अर्थव्यवस्था की तलाश

वैश्विक अर्थरचना के सामने आज यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है। अर्थरचना मानव के लिए है या मानव अर्थरचना के लिए। विश्व में आज जो भी हो रहा है, उससे तो यही पता चल रहा है कि लोग मरते हैं तो मर जायें।

कोविड-19 प्रतिरोधी अर्थव्यवस्था की तलाश

कोविड 19 पूरी दुनिया के गले का फंदा बनकर, उसकी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक समीकरणें ध्वस्त करने में लगा है। अब तक स्थापित संदर्भों के अर्थ बदल रहे हैं। अभी तक प्रचलित था, 'नजदीकियां बढ़ाइए' कोविड 19 उसे 'दूरियां बनाइये' में सफलता पूर्वक बदल चुका है। वह भी इतने जबरदस्त तरीके से, कि पहले तो आपकी किसी के नजदीक जाने की हिम्मत ही नहीं होगी, अगर गलती से हिम्मत कर भी ली, तो पुलिस का डंडा तैयार है।

 

कोविड-19 के द्वारा लगातार बिछायी जा रही लाशों के बीच दुनिया की सबसे बड़ी चिंता आर्थिक क्षेत्र को लेकर है। दुनिया के बड़े बड़े देशों की अर्थव्यवस्थायें, उसके नागरिकों की लाशों के नीचे दबती जा रही हैं। वह यह सोच पाने की स्थिति में ही नहीं है कि अपने नागरिकों की लाशों के बोझ को कम करें या अर्थव्यवस्था को उसके नीचे दबने से बचाये। इसी ऊहापोह में विकसित दुनिया वक्त को आगे खिसकाती जा रही है कि कोई देवदूत आयेगा, उन्हें इस विषम परिस्थिति से निकालने।

 

उपभोग की चरम स्थिति को विकास का पैमाना बनाने वाले, असीमित अर्थोपार्जन को जीवन का लक्ष्य मानकर चलने वाले, विश्व के सामने यह द्वंदात्मक स्थिति स्वाभाविक है। अर्थोपार्जन की श्रृंखला बाधित होना स्वीकार करने की वह मनःस्थिति में ही नहीं है, इसीलिए वह लगातार अपने नागरिकों की लाशों के नीचे दफन होती जा रही अर्थव्यवस्था को बाहर खींचने का मोह छोड़ ही नहीं पा रहा है।

 

दुनियाभर के अर्थशास्त्री और आर्थिक संस्थायें यह अनुमान लगाने में तो व्यस्त हैं कि कोविड-19 के बाद, दुनिया में अब तक की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी आने वाली है। विश्व की जीडीपी की प्रगति आने वाले इतने वर्षों तक नेगेटिव रहेगी आदि आदि। कोई इस प्रचलित अर्थव्यवस्था के विषय में यह विचार नहीं कर रहा कि इसका क्या लाभ, इसमें क्या कमी है, जिसके कारण आर्थिक प्रगति के शीर्ष पर बैठे देश भी घुटनों पर आ गये। वह अपने नागरिकों को न तो मौत के मुंह से बचा पा रहे हैं और न ही इस महामारी के समय आवश्यक उत्पादन फेश मास्क, दवाईयां, सेनेटाइजर, वेंटीलेटर और आई वी किट उपयुक्त मात्रा में जुटा पा रहे हैं। उत्पादन और उपभोग का संतुलन बैठा पाने में यह अर्थरचना कहां और क्यों असफल हो रही है। विश्व की बड़ी बड़ी कंपनियों को इन आपातकालीन परिस्थितियों में अपने उत्पादनों को बदलने की जरूरत क्यों पड़ गई।

 

यदि अमेरिका और विकसित विश्व का यह आरोप सत्य है कि कोरोना, चीन के वूहान की प्रयोगशाला से निकला मानव निर्मित विषाणु है, तब तो यह अधिक चिंता की बात है कि वर्तमान अर्थरचना में वह कौन सा तत्व है, जो मानव को मानव जाति को ही नष्ट करने की प्रेरणा देता है। संक्षेप में कहें तो अर्थरचना की वर्तमान संरचना मानव को वह उपलब्ध करा पाने में सबसे अधिक विफल है, जिसकी उसे सबसे अधिक आवश्यकता है। अतः चाहे अनचाहे वर्तमान आर्थिक संरचना, इस समय बदलाव का इंतजार कर रही है। कोविड-19 की छाया में विश्व की अर्थरचना में यह बदलाव अपेक्षित हैं।

 

इन बदलावों के संकेत भी मिलने लगे हैं। इन संकेतों को पूरा विश्व आशाभरी नजरों से देखने के साथ ही समझने का प्रयास कर रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने अर्थरचना के मानव केन्द्रित होने की बात साधारण नहीं है। यह अपने अंदर गूढ़ अर्थ समेटे हुए है। भारत ने  जिस प्रकार कोविड-19 से बचाव में देश के नागरिकों की जान बचाने को अर्थव्यवस्था से अधिक महत्व दिया है, इसे पूरा विश्व को आज नहीं  तो कल समझेगा। जब लोकतांत्रिक देशों के नागरिक अपनी सरकारों से पूछेंगे कि चन्द सिक्कों के लालच में हमारे प्रियजनों की बलि देने का अधिकार तुमको किसने दिया। वर्तमान अर्थरचना धनकेंद्रित बन चुकी है, वह धन के मोह को नहीं छोड़ सकती, इसके एवज् में चाहे देश उजड़ जायें।

 

वैश्विक अर्थरचना के सामने आज यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है। अर्थरचना मानव के लिए है या मानव अर्थरचना के लिए। विश्व में आज जो भी हो रहा है, उससे तो यही पता चल रहा है कि लोग मरते हैं तो मर जायें, अर्थरचना पर अधिक आंच न आए। अर्थव्यवस्था के इस स्वरूप की कल्पना तो इसके बुनियादी चिंतकों ने भी नहीं की होगी। 

 

इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था अपने उद्देश्य से पूरी तरह भटक गई है, यदि भटकी नहीं है तो यह बुनियादी सोच ही गलत है। कोई भी वैश्विक व्यवस्था चाहे वह सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक हो, उसके नीति निर्देशक तत्वों में मानव विरोध के विषाणु कैसे आ सकते है। वर्तमान अर्थरचना में यह जो विषाणु आ गये हैं, यह कोविड-19 से भी अधिक खतरनाक है। अतः यह अर्थरचना परिवर्तन की बाट जोह रही है। उन परिवर्तनों की जो इसके स्वरूप को लोकहितकारी बना सकें। अर्थरचना को लोकहितकारी स्वरूप देने के लिए, इसमें मानव के विचार को प्रमुखता के साथ समाहित करना होगा, अर्थरचना को मानव केन्द्रित बनाना ही पड़ेगा। विश्व के विकसित देशों और भारत की सोच के इस अंतर पर आज पूरे विश्व के लोगों का ध्यान है।

 

मोदी ने अर्थरचना के बारे में जो दूसरी महत्वपूर्ण बात कही है, वह उसे आत्मनिर्भर बनाने के बारे में है। औद्योगिक संरचना पर आधारित इस कृत्रिम अर्थरचना को, एक छोटे से प्राकृतिक विषाणु ने धूल चटा दी। जरा सोच देखिए यदि कभी खाद्यान्न या पानी से संबंधित समस्या आ गई, तो उससे सुरक्षित बचने के लिए कौन से क्वैरेंटीन में हमें जाना पड़ेगा। आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था अपने में एक बहुत बड़ा विषय है। वर्तमान संदर्भ में इसकी परिभाषा गठित करने की भी आवश्यकता है। इस परिभाषा को संपन्नता और सुरक्षा पर ध्यान केन्द्रित कर तराशना होगा। 

 

आत्मनिर्भर अर्थरचना को दूसरे शब्दों में विकेन्द्रित अर्थरचना कहा जा सकता है। इसकी उत्पत्ति में जिस विचार पर ध्यान केंद्रित होता है, वह गांव की आवश्यकता के लिए शहर या फिर शहर की आवश्यकता के लिए गांव है। वर्तमान अर्थरचना का पूरा आधार 'शहर के लिए गांव' पर आधारित है। शहर की जो आवश्कतायें हैं, गांव उन्हीके  की आपूर्ति करते हैं, अर्थव्यवस्था के इस रास्ते ने उसका केन्द्र शहर और महानगरों को बना रखा है। वर्तमान में तो अर्थरचना का केन्द्र वैश्विक है। यह धड़ाम हुई तो पूरा विश्व गढ्ढे में, आजकल यही तो हो रहा है।

 

इस अर्थव्यवस्था को अपनाने के कारण, कोविड-19 के भारत जैसी विशाल जनसंख्या वाले देश पर दुष्परिणाम साफ दिखाई दे रहे हैं। बहुत बड़ी संख्या में देश के एक कोने से दूसरे कोने तक बहुत बड़ी संख्या में मजदूरों की दुर्दशा और पलायन पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पर अट्टाहास कर रहा है। वह अपने अतिआवश्यक घटक मजदूर को, वक्त के तकाजे के अनुसार, अपने साये में कुछ समय के लिए सुरक्षित रख पाने में बुरी तरह असफल रहा है, वह उसके लिए जीवनावश्यक वस्तुओं का प्रबंध नहीं कर पाया है, अतः उसे मजबूर होकर अपने जीवन को सुरक्षित रखने की खातिर हजारों किलोमीटर के फासले को पैदल लांघकर, उसी जगह का सहारा लेने के लिए निकलना पड़ा है, जिसकी वर्तमान आर्थिक संरचना ने लगातार उपेक्षा की है। भारत जैसे देश में पुरातन ग्रामीण अर्थव्यवस्था असंख्य थपेड़ों के बावजूद नेस्तनाबूद होने से बची रही। आज वह जीर्ण-शीर्ण स्थिति में होने के बाद भी करोड़ों श्रमिकों को अपनी गोद में अभयदान देने के लिए, दोनों बाहें फैलाए तैयार खड़ी है। 

 

वर्तमान अर्थरचना की विडंबना देखिए, जिस शहर को केन्द्र बनाकर, वह मजदूरों का गांवों से पलायन करना कर, शहर में खींच लाई। वर्षानुवर्ष अनुकूलता में रहने के बाद भी, हवा का जरा सा विपरीत झोंका आते ही, सिर्फ 2-3 महीनों में ही, वह उसे वापस उसी गांव में जीवन का आधार तलाश करने के लिए फेंक आई। वहां तक उसे सुरक्षित फेंका नहीं, बल्कि घिसट घिसट कर उसे उस दिशा में रेंगने के लिए, असहाय छोड़ दिया। अजीब बात है, विश्व के अर्थशास्त्रियों को यह नजर नहीं आ रहा या किसी विशेष कारण से तोते की तरह आंखें फेर बैठे हैं।

 

आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का सरसरे तौर पर ही, परंतु थोड़ा सोचकर देखिए। यदि अर्थरचना गांव केन्द्रित होती, आत्मनिर्भर होती तो कोविड-19 जैसी समस्या का निदान कितना सरल होता। माइक्रो(विकेंद्रित) अर्थरचना होने के कारण न तो इतनी बड़ी संख्या में पलायन होता, न ही क्वैरेंटीन जैसी योजनाओं को लागू करने में कोई बड़ी परेशानी। और तो और पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था भी वर्तमान की तरह न तो ठप्प पड़ती, न ही उसके आपातकालीन स्थिति में जाने के हालात बनते। कोविड-19 जैसी संक्रामक बीमारी की स्थिति में भी, लाक डाउन, क्वैरेंटीन, इलाज एक तरफ चलता और उत्पादन दूसरी तरफ, वह भी पूरे जोर शोर के साथ। लोगों की मौत की बात छोड़िए, विश्व में कोरोना जैसी संक्रामक बीमारी के इतने मरीज भी न होते। अर्थरचना सिर्फ अधिक और अधिक धन कमाने वाली नहीं, लोकाभिमुख भी होनी चाहिए। अब विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का क्या लाभ, यदि वहार में अर्थव्यवस्था अपने नागरिकों को मरने से न बचा पाए। 

 

मानव केन्द्रित, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का यह अर्थ नहीं कि उद्योगों को एक किनारे कर दिया जाये। दोनों में संतुलन होना चाहिए। वैसे भी वर्तमान कम्प्यूटराइज्ड और रोबोटिक्स के युग में बड़े बड़े उद्योगों में मजदूरों की मांग कम होती जा रही है। अतः आने वाले समय में आत्मनिर्भर विकेंद्रित अर्थव्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण हो जायेगी।

 

अतः आज कोविड-19 के समय जर्जर होती जा रही अर्थव्यवस्था को तलाशने की नहीं, तराशने की आवश्यकता है, कुछ इस तरह के आकार में, जो मानव केन्द्रित हो, आत्मनिर्भर हो और लोकहितकारी हो और वह लोगों को भविष्य में कोविड-19 जैसी बीमारियों से अक्षुण्ण रखने में सफल हो।

Economy Kovid-19 world economy G7countries