देश के पत्रकार : क्‍या से क्‍या हो गये देखते-देखते

1950 के दशक से जहां पत्रकार को ईमानदार, लालच से दूर रहने वाले लोगों के किरदार में दिखाया जाता था, वहीं पिछले चार दशकों में अब मीडिया को मूर्खतापूर्ण और टीआरपी का लोभी बताया जाता है

देश के पत्रकार : क्‍या से क्‍या हो गये देखते-देखते
Desh 24X7
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November 7,2021 12:07

समाज की सोच का असर सभी तरफ पड़ता है। पत्रकार जो सभी की आवाज बनकर कभी क्रांति लाता है तो कभी इंसाफ दिलाने में अपनी अहम भूमिका निभाता है, विकास की योजनाएं हों अथवा सरकार के लड़खड़ाते कदमों को सहारा देना हो या पथभ्रष्ट हो रहे नेताओं पर लगाम कसनी हो, विभिन्न आयामों में पत्रकार अपनी भूमिका का निर्वहन करता आया है लेकिन बीते कई दशकों में पत्रकारों के बारे में बॉलीवुड और लोक संस्कृति का नजरिया किस तरह बदल गया है इसे वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता ने बड़े ही अच्छे ढंग से अपने शब्दों में प्रस्तुत किया है।

 

 

द प्रिंट में अपने लेख मैं शेखर गुप्ता कहते है कि 1950 के दशक में पत्रकारों को बदमाशों का खेल खत्म करने वाले और हीरोइन का दिल जीतने वाले अच्छे आदमी के रूप में पेश किया जाता था लेकिन आगे चलकर इन पत्रकारों को धूर्त, तिकड़मी, षड्यंत्रकारी, टीआरपी लोभी और एक तरह से जोकर के रूप में ही पेश किया जाने लगा। लेख में कहा गया है कि 1950 और 1960 के दशकों का सिनेमा समाजवादी होता था इसके बाद 1970 के दशक में यह सिनेमा लोकलुभावन कारी हो गया और इसके बाद आर्थिक सुधारों के दौर में यह अमीरी के बेहिसाब शहरी आडंबर में उलझ कर रह गया। 

 

 

लेख में कहा गया है कि 1958 की राज खोसला की फिल्म काला पानी में हीरो देवानंद ने पत्रकार की भूमिका निभाई है, यह पत्रकार कत्ल के झूठे आरोप में उम्रकैद झेल रहे अपने पिता को बरी करवाना चाहता है फिल्म में दिखाया गया है कि पत्रकार बंबई से हैदराबाद पहुंचता है और फिर असलियत जानने के लिए पुराने अखबारों को खंगालने एक अखबार के दफ्तर पहुंच जाता है इसी अखबार में फिल्म की हीरोइन मधुबाला रिपोर्टर की भूमिका में है जाहिर है फिल्मी नजरिए से इसके बाद दोनों की कहानी आगे बढ़ती है और दोनों पत्रकारों की जीत होती है।

 

 

इसी तरह 1956 में गुरुदत्‍त की फिल्म सीआईडी में भी देवानंद हीरो हैं हालांकि देवानंद इसमें पत्रकार नहीं बल्कि एक इमानदार सीआईडी इंस्पेक्टर बने हैं और वह बहुत निडर दिखाए गए हैं लेकिन इसकी कहानी के केंद्र में एक कुशल संपादक है श्रीवास्तव, यह संपादक धमकियों और प्रलोभनों को ठुकराते हुए माफिया के पीछे पड़ जाता है उधर सीआईडी इंस्पेक्टर बने देवानंद को हत्यारे और मास्टरमाइंड को पकड़ने की जिम्मेदारी दी गई है और उन्हें अपने बॉस की रखैल की भूमिका निभा रही वहीदा रहमान से मदद मिलती है और अंत में सच्चाई और साहसी पत्रकारिता की जीत होती है।

 

 

एक और उदाहरण देवानंद की फिल्म ‘16वां साल’ का दिया गया है इसमें देवानंद एक ईमानदार और चहेते रिपोर्टर प्राणनाथ की भूमिका में है इस फिल्म में वे ट्रेन में सफर करते हुए ‘है अपना दिल तो आवारा’ गाते हुए फिल्म की हीरोइन वहीदा रहमान से टकरा जाते हैं,  वहीदा रहमान अपने परिवार से छिपकर विलेन टाइप के प्रेमी के साथ भाग रही है फिर फिल्म की कहानी कुछ इस तरह आगे बढ़ती है कि लड़की उस विलेन टाइप के प्रेमी को छोड़कर रिपोर्टर की हो जाती है।

 

 

एक और फिल्म ‘चोरी चोरी’ में बेरोगगार और स्‍वतंत्र पत्रकार सागर की भूमिका में राजकपूर को दिखाया गया है। जो कि लालच से दूर है और ईमानदार है। इसी तरह एक और फिल्म गुरुदत्त की ‘मिस्टर एंड मिसेस 55’ में गुरुदत्त को एक बेरोजगार कार्टूनिस्ट दिखाया है जो ललिता पवार के उसे टोकने के बावजूद जो है उसी में संतोष करने वाले पत्रकार की भूमिका में दिखाया गया है।  

 

 

इसके बाद फिल्म निर्माण में आए बदलाव का दौर शुरू होता है और पिछले चार दशकों में कोई ऐसी फिल्म नहीं मिली जिसमें पत्रकार को मूर्ख, विलेन, बेवकूफ के रूप में पेश करके उसका मजाक न बनाया गया हो यहां तक कि उसके लिए गालियों का भी प्रयोग किया गया है। इसके उदाहरण में 1983 की फिल्म ‘जाने भी दो यारों’ में अखबार की संपादक भक्ति बर्वे अमीरों और भ्रष्ट लोगों का भांडा फोड़ने के लिए अनाड़ी किस्म के दो फोटोग्राफर नसीरुद्दीन शाह और रवि वासवानी का इस्तेमाल करती है लेकिन अंत में वह सौदा करके उन दोनों को जेल जाने देती है। फिल्म पीपली लाइव और पीके जैसी फिल्मों में भी टीवी पत्रकारों का मजाक बनाया गया है यह भी दुर्भाग्य है कि इन फिल्मों में महिला पत्रकारों को पेश किया गया है।

 

 

शेखर गुप्ता के लेख में बताया गया है कि जब से टीवी पत्रकारिता की शुरुआत हुई है सभी से पत्रकारों के साथ बॉलीवुड का रोमांस भी शुरू हुआ है कारगिल युद्ध पर केंद्रित 2004 के फिल्म लक्ष्य में प्रीति जिंटा ने पत्रकार बरखा दत्त से मिलते-जुलते किरदार को निभाया है लेकिन इसके बाद से पतन शुरू हो गया है अजीज मिर्जा की फिल्म ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी’ में शाहरुख खान टीवी चैनलों के एंकर की गड़बड़ियों को उजागर करते हैं और उसके बाद पीपली लाइव तक आते-आते मीडिया को मूर्खतापूर्ण और टीआरपी का लोभी यानी एक बुराई के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है।

 

 

लेख में बताया गया है कि अब तो पत्रकारों की अच्छी छवि पेश किए जाने की कल्पना तक नहीं की जा सकती सिवाय स्कैम 1992 जैसी फिल्म के,  जिसमें खोजी पत्रकार सुचिता दलाल के किरदार का उपयोग किया गया है यह 1992 के दौर पर आधारित सीरीज है इसमें सुचेता का किरदार निभाने वाली प्रतिभाशाली अभिनेत्री श्रेया धनवंतरी हॉटस्टार की फिल्म मुंबई डायरीज में टीवी पत्रकार की भूमिका निभा रहे हैं इस फिल्म में वह 26/11 के आतंकवादी हमलों को कवर करती हैं और वह अनैतिक काम करते देखती है यहां तक कि‍ इसमें उन हालात को सांप्रदायिकता के रंग में रंगने की अति कर दी गई है। 

 

 

इसी प्रकार पाताल लोक नेटफ्लिक्स निर्मित राम माधवानी की फिल्म धमाका, चक दे, पा, संजू का जिक्र किया गया है। शेखर गुप्ता का मानना है कि लोक संस्कृति में पत्रकारिता खासकर महिला पत्रकारों का दर्जा सोशल मीडिया पर उनकी निंदा और उन पर हमलों के कारण गिरा है। उनका कहना है अगर कोई यह कहे कि अब हम क्या कर सकते हैं तो इसका जवाब उन्हें 1950 के दौर की फिल्में दे सकती हैं।

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