आर्थिक मोर्चे पर बुनियादी बदलावों की जरूरत, ग्राहक को केन्द्र बनाना होगा

अर्थरचना कोई भी हो वह उन अपेक्षित कसौटियों पर खरी नहीं उतर पाई, जिनके लिए उसकी रचना की गई थी। उसने समाज का विकास तो किया, लेकिन असंतुलित विकास किया।

आर्थिक मोर्चे पर बुनियादी बदलावों की जरूरत, ग्राहक को केन्द्र बनाना होगा

वस्तुओं और सेवाओं की खरीद बिक्री से संबंधित मामलों को ही अमूमन ग्राहक आंदोलन समझा जाता है। दुनिया भर में लोग इसी काम को ग्राहक आंदोलन का नाम देकर इसमें लगे हुए भी है, खरीद-बिक्री प्रक्रिया से उपजे विवादों का निराकरण एक विवाद निवारण प्रक्रिया है, इसे संपूर्ण ग्राहक आंदोलन का नाम नहीं दिया जा सकता, लेकिन वास्तव में ग्राहक आंदोलन इससे इतर ही बहुत कुछ है। उसके बारे में तभी सही रूप में जाना समझा जा सकता है, जब इससे जुड़े सभी घटकों की सिलसिलेवार तरीके से उचित विवेचना की जाये।

 

ग्राहक का केन्द्र अर्थरचना में है। अतः ग्राहक आंदोलन को आर्थिक आंदोलन कहना गलत नहीं होगा। यह दीगर बात है कि ग्राहक को अर्थरचना के घटक के रूप में किसी भी अर्थव्यवस्था ने मान्यता नहीं दी गई, उसे सिर्फ और सिर्फ लाभार्थी मान लिया गया, जबकि अन्य अवयवों को महत्त्वपूर्ण घटक मानकर अर्थरचना को उसी पर केन्द्रित कर दिया। यह बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता कि कोई भी घटक महत्वपूर्ण नहीं है। सभी महत्वपूर्ण हैं, सभी को उनका उचित स्थान मिलना चाहिए।

 

अंततोगत्वा किसी भी अर्थरचना को बनाने का उद्देश्य सभी का कल्याण रहा होगा, इस बात को समाज सेवियों का सज्जन वर्ग कहता है। यह वर्ग क्योंकि सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के कार्यों में लगा रहता है, इसलिए वह इस बात को कह सकता है। हम यह बात नहीं कहेंगे, हम विवेचना करेंगे और निष्कर्ष पर पहुंचेंगे।

 

अर्थरचना

अर्थरचना की उत्पत्ति को आज का अर्थशास्त्र पढ़ने वाले, एड्म स्मिथ से जोड़ते हैं, उसे ही अर्थशास्त्र का जनक मानते हैं। उन्हें एड्म स्मिथ के पूर्व के अर्थशास्त्र की न तो जानकारी है, न ही वह इस जानकारी को सहेजना चाहते हैं। वैसे भी 7 से 8 हजार वर्ष पुरानी भारतीय सभ्यता के विषय में वह जानकारी लेने से दूर ही रहना चाहते हैं। क्योंकि यह एक जटिल कार्य है। हमें मनु स्मृति, यज्ञवलक्य स्मृति, ॠगवेद, चाणक्य और आचार्य कौटिल्य के साहित्य में आर्थिक विष्लेषण मिलते हैं, लेकिन यह विष्लेषण उस स्वरूप में नहीं हैं, जिसमें आज के विद्वान देखना चाहते हैं।

 

प्राचीन संदर्भों में समाज जीवन केन्द्र में होता था, उसके उचित निर्वाह, सामंजस्य और प्रगति के लिए सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व पारिवारिक व्यवस्थाओं की जो भी संरचना होनी चाहिए, उसका एकरूप वर्णन भारत के प्राचीन साहित्य में मिलता है, यह वर्णन एकात्म स्वरूप में है, जिस स्थान पर जितनी मात्रा में आवश्यक है उतनी ही मात्रा में हैं, फिर चाहे आप वेद देख लीजिए या फिर रामायण, गीता और महाभारत में, अब इसे अलग अलग कर, एक साथ रखने की जहमत कौन उठाये। इसलिए आज की पीढ़ी ने कहा दिया, वैदिक काल में राजनीति, सामाजिक और आर्थिक साहित्य था ही नहीं। इस वर्ग ने इस कठोर सच्चाई से भी आंख मूंद ली कि यूरोप की औद्योगिक क्रांति के पूर्व भारत में राज्य, समाज, परिवार और आर्थिक व्यवस्थायें थी, उनका सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय वाला स्वरूप था। यह व्यवस्थायें हमारे देश, समाज और परिवार में अंग्रेजी शासन में भी चलती आई और तब तक सफलता से चली जब तक उन पर यूरोप की औद्योगिक क्रांति से उपजी अर्थव्यवस्था को थोपा गया नहीं गया।

 

अर्थरचना कोई भी हो वह उन अपेक्षित कसौटियों पर खरी नहीं उतर पाई, जिनके लिए उसकी रचना की गई थी। उसने समाज का विकास तो किया, लेकिन असंतुलित विकास किया, अपेक्षा यह थी कि वह संपूर्ण समाज का संतुलित विकास करेगी, लेकिन एक बार संतुलन बिगड़ने पर किसी के ध्यान न देने के कारण आकाश-पाताल का अंतर समाज में साफ नजर आता है।

 

अर्थरचना के नाम पर पूंजीवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं, लेकिन इसमें अर्थरचना के सभी घटकों के कल्याण का विचार नहीं है और यदि कहीं इस विचार की झलक देखने को मिल भी जाये, तो वह उसी सीमा तक दिखाई देगी, जहां से वर्ग विशेष के हित सधते हैं। अगर दूसरे शब्दों में कहें तो सभी घटक एक दूसरे के अधिकाधिक शोषण में लगे हैं, हां दूसरे घटकों का कल्याण करने का दिखावा जरूर करना पड़ता है। इन स्थितियों में सतही ग्राहक आंदोलन तो चलाया जा सकता है। लेकिन वह न तो व्यापक होगा, न ही प्रभावी। दूसरे ग्राहक के असंगठित होने, आवश्यकताओं की आपूर्ति की बाध्यता के कारण भी कमजोर ग्राहक आंदोलन के जिम्मेदार हैं।

 

पूंजीवाद की कमियों को पहचाना नहीं गया या इसके निवारण के प्रयास नहीं किए गये यह कहना भी उचित नहीं होगा। प्रयास किये गये, सफल भी हुए लेकिन संपूर्ण समाज के स्थान पर वर्ग विशेष को ध्यान में रखकर किये गये यह प्रयास सफल नहीं हो सके और विश्व के जिन देशों ने नवीन प्रयासों, जिसे साम्यवाद नाम दिया गया, को अपनाने की कोशिश की थी वापस पूंजीवादी व्यवस्था पर लौट गये।

 

अर्थरचना का प्रारंभिक विचार करने वालों अर्थशास्त्र को विशुद्ध वैज्ञानिक, गणितीय मान कर ही बुनियादी गलती कर दी थी। यह पश्चिम का विचार था, पूरा विश्व इसके पीछे भागा था और आज भी भाग रहा है। दुनिया के विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थायें बार बार बीमार पड़ती हैं, उनका इलाज भी किया जाता है, लेकिन वह पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो पाती, कुछ तो स्वस्थ होने के प्रयास में सिधार भी जाती हैं।

 

वास्तव में वर्तमान अर्थशास्त्र लंगड़ा है, अपनी एक टांग को उसने पूरी तरह भुला दिया है, बस एक टांग के सहारे स्वस्थ व्यक्ति के समकक्ष तेज गति से दौड़ना चाहता है, प्रतिस्पर्धा करना चाहता है। इसी चक्कर में बार बार उखड़ता है, गिरता है। अर्थशास्त्र के बुनियादी ढ़ांचे का आधार सामाजिक-अर्थशास्त्र (Socio-Economics) है। समाजशास्त्र में समाहित होने के बाद ही अर्थशास्त्र का सही स्वरूप उभरेगा।

 

यदि प्रारंभ में ही विश्व भारत की प्राचीन आर्थिक संरचना को समझ लेता तो वर्तमान की विषम परिस्थितियों से न जूझना पड़ता। नागपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री म गो बोकरे, ने जब हिन्दू अर्थशास्त्र (Hindu Economics) लिखी तो उन्होंने एक विचित्र किन्तु समझदारी का काम किया। उन्होंने अपनी पुस्तक भारतीय अर्थशास्त्रियों को न दिखाकर, पश्चिम के अर्थशास्त्रियों को दिखाई। सभी पुस्तक देखकर हतप्रभ थे। उन्होंने यह भी कहा कि हमारे लिए यह विधा पूरी तरह नवीन है, लेकिन इस विधा पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।

 

यही नहीं जब वर्ष 2007 से 2009 के बीच अमेरिका की अर्थव्यवस्था में भयानक गिरावट आई, तो दुनियाभर के अर्थशास्त्री गिरावट से निकलने का उपाय सुझाने की जगह, आगे क्या होगा यह देखने समझने में ही लगे रहे। लेकिन उस समय मैनचेस्टर विश्वविद्यालय का अर्थशास्त्र विभाग सचेत हो गया और इस गिरावट आने के कारणों की मीमांसा करने में जुट गया। उसने इस जबरदस्त मंदी से उबरने के उपाय भी खोजने चाहे। जब उसे मंदी से उबरने के उपाय समझ नहीं आये, तो उसने विश्वविद्यालय में पढ़ाये जाने वाले अर्थशास्त्र के पूरे पाठ्यक्रम की उपयोगिता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया और संगठित होकर वैकल्पिक मार्ग की तलाश में जुट गए। आज उनके साथ विश्व के 80 से अधिक विश्वविद्यालय इस कार्य में जुटे हैं।

 

वह जिन निष्कर्षों पर पंहुच रहे हैं, वह दिशा भारत की प्राचीन अर्थव्यवस्था की तरफ जाती है। वह 'अर्थशास्त्र के समाज पर प्रभाव' को देखते समझते 'समाज के अर्थशास्त्र पर प्रभाव' मानने को मजबूर होते जा रहे हैं। इसी कारण वह विश्वविद्यालय से कह रहे हैं कि अर्थशास्त्र के पाठ्यक्रम में भोगोलिक व सामाजिक विषयों को भी सम्मिलित किया जाये।

(लेखक आर्थिक एवं ग्राहक मामलों के विशेषज्ञ)

 

 

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