बीजों के प्रमाणीकरण से कृषि उत्पादन में 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी संभव

भारत में हमेशा से यह त्रासदी रही है कि किसानों को बेचे जाने वाले आधे से अधिक बीज, किसी परीक्षण एजेंसी द्वारा सत्यापित नहीं होते हैं और अक्सर कमजोर गुणों वाले होते हैं।

बीजों के प्रमाणीकरण से कृषि उत्पादन में 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी संभव

केन्द्र सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में सीड्स एक्ट, 1966 को बदलकर एक नया कानून लाने पर विचार कर रही है, जिसमें सिर्फ परीक्षण किये बीजों को ही बेचने की अनुमति होगी, साथ ही सभी बीजों का आसानी से पता लगाया जा सके, इसलिए सभी बीजों की बार कोडिंग भी की जायेगी।

 

कृषि मंत्रालय के एक अधिकारी के अनुसार इस कदम से कृषि उत्पादकता को 25 प्रतिशत तक बढ़ाने में मदद मिलेगी।

 

वर्तमान कानून आधे शतक के पहले बनाया गया था, इसमें तुरंत बदलाव करने की जरूरत है। अब तकनीक बदल गई है, किसानों की उम्मीदें बदल गई हैं, यहां तक कि बीज की परिभाषा भी बदल गई है। पेड़ लगाने से संबंधित विषय जैसे कटिंग, ग्राफ्टिंग और टिसू कल्चर को भी कानून की परिधि में लाने की जरूरत है, एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया।

 

नया कानून जो कैबिनेट की मंजूरी के लिए तैयार हैं, उसका उद्देश्य गुणवत्ता नियंत्रण के मामले में एकरूपता लाना है। 1966 का कानून इन शब्दों से शुरू होता है, बिक्री के लिए प्रस्तुत कुछ बीजों की गुणवत्ता को नियंत्रित करने के लिए कानून...। नये कानून में 'कुछ' शब्द को हटा लिया गया है और इसका उद्देश्य देश में बिकने वाले सभी बीजों की गुणवत्ता को नियंत्रित करना है, यहां तक कि यह निर्यात और आयात किए जाने वाले बीजों की गुणवत्ता के संबंध में भी है।

 

वर्तमान में लगभग 30 प्रतिशत बीज वह हैं, जिनको किसान अपनी फसलों से बचा कर रखता है। वह इन बीजों की बुआई भी कर सकता है, उन्हें स्थानीय बाजार में बेच भी सकता है, एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने कहा। उसने बताया कि जो बचे हुए बीज व्यवसायिक रूप में खरीदे बेचे जाते हैं, उनमें से 45 प्रतिशत ICAR सिस्टम के माध्यम से आते हैं। यह बीज अनिवार्य परीक्षण की सभी प्रक्रियाओं से होकर गुजरते हैं।

 

अन्य 55 प्रतिशत बीज निजी कंपनियों के द्वारा बेचे जाते हैं, जिनमें से अधिकतर सत्यापित नहीं होते है। हम उन्हें 'ट्रुथफुल लेबल सीड्स' कहते हैं। इन बीजों को कंपनियां स्वयं सत्यापित करती है। हम नये कानून के द्वारा बीजों की इस श्रेणी को हटाना चाहते हैं और सभी बीजों का उपयुक्त प्रयोगशाला के द्वारा सत्यापन अनिवार्य करने वाले हैं, उन्होंने कहा।

 

किसानों के लिए 'ट्रुथफुल लेबल सीड्स' आत्मघाती हो सकते हैं, इन्हें रोकने की जरूरत है, कृषि एवं फूड पालिसी के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा ने कहा। वह संशोधित बीज कानून से उस समय से सम्बद्ध हैं, जब 2004 में उसका मूल प्रस्तावित किया गया था।

 

यह विधेयक बहुत लम्बे समय से लंबित है, लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि कंपनियां जिन बीजों को बेचती हैं, उनकी गुणवत्ता के लिए और वह जो दावे करते हैं, उसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाये। यदि अंकुरण, पुष्प निकलने या स्थायी होने की प्रक्रिया में ही बीज फेल हो जाता है, तो जिस कंपनी ने बीज बेचा है, उसे जिम्मेदार ठहराया जाये और उससे मुआवजा दिलवाया जाए, उन्होंने कहा।

 

नये कानून में, उसके प्रावधानों को न मानने वालों के लिए जुर्माने की रकम भी बढ़ाई गई है। वर्तमान कानून में जुर्माना ₹500 से ₹5000 तक है। हमारा इरादा उसे बढ़ाकर अधिकतम ₹5 लाख करने का है, एक अन्य अधिकारी ने कहा।

 

केन्द्र सरकार बीजों में पारदर्शिता और आसानी से ढूंढ पाने के लिए एक साफ्टवेयर द्वारा बीजों के लिए बारकोड जारी करने की प्रक्रिया भी आपना रही है। नेशनल इन्फार्मेटिक सेन्टर कृषि मंत्रालय के साथ मिलकर एक योजना बना रही है और उसके लिए पहला प्रोटोटाइप इस माह के अंत तक तैयार हो जायेगा। यदि हम इस प्रक्रिया के द्वारा खराब गुणवत्ता वाले बीजों की बिक्री को रोक पाने में सफल हुए, तो इससे कृषि उत्पादकता 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ जायेगी, एक अधिकारी ने कहा। हम राज्य सरकारों के साथ चर्चा कर रहे हैं, कि इसे दो से तीन महीनों में आगे बढ़ाया जाये। लगभग 5000 निजी कंपनियां इसके लिए सहमत हो गई हैं, वह हमसे यह आश्वासन चाहती हैं कि हम उनके बीजों के परीक्षण से संबंधित जानकारी उनके प्रतिस्पर्धियों के साथ साझा न करें।

 

साफ्टवेयर सिस्टम परीक्षण प्रमाणपत्र की मदद से बीजों पर और उन्हें बनाने की प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए सक्षम होगा। डीलर के लाइसेंस सिस्टम की मदद से भी बीजों को बांटने की प्रक्रिया पर नजर रखी जा सकेगी। इस प्रक्रिया को शुरू होने में दो वर्ष का समय लगेगा, एक बार यह स्थापित हो गया, त्यों हम यह बता सकेंगे कौन सा बीज कितनी मात्रा में किस क्षेत्र में बेचा गया है, एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया।

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