जानें कैसे 27 वर्षीय शांतनु बनेे 81 वर्षीय रतन टाटा के सबसे चहेते सहयोगी और सलाहकार

स्ट्रीट डॉग्स को बचाने के लिए खास बेल्ट बनाने वाले शांतनु से टाटा इतने प्रभावित हुए कि उन्हें पर्सनल निवेश का पूरा काम संभालने की जिम्मेदारी सौंपी

जानें कैसे 27 वर्षीय शांतनु बनेे 81 वर्षीय रतन टाटा के सबसे चहेते सहयोगी और सलाहकार
Desh 24X7
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November 5,2019 01:58

दिग्गज बिजनेस लीडर, निवेशक और टाटा ग्रुप के पूर्व चेयरमैन। टाटा के ओला, पेटीएम, स्नैपडील जैसे 30 से ज्यादा स्टार्टअप्स में पर्सनल निवेश का पूरा काम संभालते हैं 27 साल के शांतनु नायडू। उनका काम रतन टाटा को स्टार्टअप निवेश में मदद करने के साथ एग्जीक्यूटिव असिस्टेंस (कार्यकारी सहायता) देना है। इतनी कम उम्र में टाटा के साथ उनके जुड़ने की बड़ी ही दिलचस्प कहानी है। शांतनु की जुबानी जानिए वे कैसे टाटा के साथ भारत के उभरते स्टार्टअप्स में निवेश का काम करते हैं....

 

 

शांतनु बताते हैं, 'मैं पुणे की टाटा एलेक्सी में एक ऑटोमोबाइल डिजाइन इंजीनियर के तौर पर काम करता था। काम खत्म करके देर रात को विमान नगर हाइवे से होकर घर जाने के दौरान रास्ते में गाड़ियों की तेज रफ्तार की चपेट में आकर बहुत से डॉग्स को मरते देखा। इस तरह की घटनाएं काफी परेशान करती थीं। फिर, मैंने उनकी जान बचाने का तरीका खोजने के लिए लोगों से बात की। मुझे पता चला कि ड्राइवर का समय रहते डॉग्स को नहीं देख पाना दुर्घटनाओं का बड़ा कारण था। चूंकि मैं एक ऑटोमोबाइल इंजीनियर था। इसलिए मेरे मन में तुरंत डॉग्स के लिए एक कॉलर बनाने का आइडिया आया।

 

 

इससे ड्राइवर रात में स्ट्रीट लाइट के बगैर भी उन्हें दूर से देख सकते थे। कॉलर बेस्ट ग्रेड रेस्ट्रो रिफ्लेक्टिव मैटेरियल यानी चमकदार मैटेरियल से बना था। दोस्तों की मदद से यह संभव हुआ। मोटोपॉज नाम की इस छोटी सी कोशिश ने काफी लोगों का ध्यान खींचा। अब स्ट्रीट डॉग्स की जान बच रही थी। इस छोटे से लेकिन महत्वपूर्ण काम के बारे में टाटा समूह की कंपनियों के न्यूजलेटर में लिखा गया। फिर इस पर रतन टाटा की नजर पड़ी, जो खुद भी डॉग्स से काफी लगाव रखते हैं। शांतनु के पिता के कहने पर टाटा काे पत्र भी लिखा। एक दिन मुंबई में शांतनु को रतन टाटा से उनके ऑफिस में मिलने का न्योता मिला।

 

 

 

रतन टाटा की वजह से  मोटोपॉज की पहुंच देश के 11 अलग-अलग शहरों तक हो गई

 

शांतनु अपने परिवार की पांचवीं पीढ़ी हैं, जो टाटा ग्रुप में काम कर रही है। इनमें ज्यादातर इंजीनियर और टेक्निशियन के तौर पर काम करते थे। इनमें कोई एग्जीक्यूटिव्स नहीं थे। इस वजह से इससे पहले कभी टाटा से नहीं मिले थे। शांतनु बताते हैं कि टाटा ने मुझसे पूछा कि स्ट्रीट डॉग्स प्रोजेक्ट में किस तरह की मदद चाहते हैं। मैंने कहा कि हम कोई मदद नहीं चाहते। हालांकि, हम स्टूडेंट्स थे तो उन्होंने जोर दिया और हमारी कोशिश में निवेश किया। रतन टाटा के पैसा लगाने के बाद मोटोपॉज की पहुंच देश के 11 अलग-अलग शहरों तक हो गई है। हाल में हमें नेपाल और मलेशिया से कॉलर की डिमांड मिली है। इसी बहाने टाटा से लगातार मुलाकात होती रही।

 

 

'वह कभी महसूस नहीं होने देते कि टाटा के साथ काम कर रहे हैं'

 

शांतनु बताते हैं, 'एक दिन मैंने उनसे कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में एमबीए करने की बात बताई। मुझे वहां एडमिशन भी मिल गया। साल 2018 की बात है, उन्होंने मुझे अपना ऑफिस जॉइन करने के लिए कहा। इस तरह का मौका जिंदगी में एक ही बार मिलता है। उनके साथ रहकर हर मिनट कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता है। वे सभी लेटेस्ट ट्रेंड्स से भी वाकिफ रहते हैं। मैं अपने युवा नजरिए को बहुत सी चीजों से जोड़ता हूं, जिसकी वह तारीफ करते हैं। उनके साथ रहना और देखना कि वह कैसे अपने निर्णय लेते हैं' यह अपने आप में एक शिक्षा है। वह आपको कभी यह महसूस नहीं होने देते कि आप रतन टाटा के साथ काम कर रहे हैं।'

 

 

टाटा के अनुभव का फायदा स्टार्टअप्स को मिलता है

 

81 साल के रतन टाटा का देश के स्टार्टअप इकोसिस्टम में गहरा विश्वास है। जून 2016 में रतन टाटा की प्राइवेट इन्वेस्टमेंट कंपनी आरएनटी असोसिएट्स और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया ऑफ द रीजेंट्स ने भारत में यूसी-आरएनटी फंड्स' के रूप में नए स्टार्टअप, नई कंपनियों और अन्य उद्यमों को फंड देने के लिए हाथ मिलाया था। हालांकि, रतन टाटा के ज्यादातर निवेशों की रकम के बारे में जानकारी नहीं है लेकिन जो भी स्टार्टअप उन्हें अपने साथ लाने में सफल होते हैं, उन्हें वित्तीय मदद से हटकर रतन टाटा के अनुभव का खजाना मिल जाता है। भविष्य में उनकी सफलता की संभावना भी बढ़ जाती है।

Chairman Emeritus of Tata Group Ratan Tata Engineer Shantanu Naidu Tata Group