मोदी को नया चेहरा तो मिला पर तीन पॉवर सेंटर में क्यों बंट गया गुजरात ?

सीएम बदलने के दुष्परिणाम अपरिहार्य हैं पर ऐसा करना मज़बूरी था....क्यूंकि यूपी की जीत जहाँ मोदी को संख्याबल का हौसला देगी वहीँ अपने गढ़ गुजरात को फिर से पा लेना उनकी साख को बरकरार रखेगा

मोदी को नया चेहरा तो मिला पर तीन पॉवर सेंटर में क्यों बंट गया गुजरात ?
दीपक शर्मा
दीपक शर्मा

September 13,2021 02:27

गांधीनगर में जब भूपेंद्र पटेल का नाम नए मुख्यमंत्री के लिए तय किया गया तो वहां खड़े भाजपा के बड़े नेताओं के बीच सबसे उदास चेहरा मनसुख मंडाविया का था।पर मनसुख के चेहरे पर घोर उदासी की अपनी वजह थी। दरअसल आज से कोई छह महीने पहले केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया को पीएम मोदी, गुजरात का नया मुख्यमंत्री  बनाना चाहते थे। लेकिन मनसुख की ताजपोशी दो अहम कारणों से टल गयी। 

 

 

जानकारों के मुताबिक पहला कारण ये था कि गृह मंत्री अमित शाह, युवा मनसुख के नाम पर तैयार नहीं हुए। दूसरा कारण ये रहा कि उसी समय कोविड फिर तेज़ी से गुजरात में कहर ढहाने लगा। इसके कुछ महीनों बाद पीएम मोदी ने मनसुख को तो प्रमोट करके देश का स्वास्थ्य मंत्री बना दिया पर वो गुजरात का अपना मूल अजेंडा नहीं भूले। उधर बार बार के गोपनीय सर्वे भी ज़ाहिर कर रहे थे कि गुजरात की बागडोर विजय रुपानी से सम्भल नहीं रही है और अगर उनका रिप्लेसमेंट जल्द नहीं ढूंढा गया तो अगले चुनाव में बीजेपी को हार का मुँह देखना पड़ सकता है।

 

 

बिलकुल नये और गैर-विवादास्पद नेता की तलाश में थे मोदी  

 

 

पीएम के निकट सूत्रों के अनुसार मोदी एक ऐसा चेहरा ढून्ढ रहे थे जो नया भी हो और विवादास्पद भी न हो। शायद इसलिए उन्होंने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सी आर पाटिल के नाम को खुद ही खारिज कर दिया। हालाँकि पाटिल को मोदी का बेहद करीबी माना जाता है पर पाटिल का इतिहास विवादों और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा है। पुलिस कांस्टेबल रहे पाटिल ने जिस तरह से सार्वजनिक जीवन में पैसा कमाया था उस पर सूरत से लेकर अहमदबाद तक में उंगलियां उठती रही हैं। यही नहीं, पाटिल के नाम पर अमित शाह को भी मनाना मुश्किल था। इसी तरह उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल अनुभव और जातिगत समीकरण के हिसाब से सीएम की कुर्सी के लिए यूँ तो मुफीद थे लेकिन उनकी छवि विजय रुपानी जैसी ढीले-ढाले और सहज मुख्यमंत्री वाली थी। इसलिए नितिन को परखने का ज्यादा मतलब नहीं था। 

 

 

सूत्रों ने बताया कि पीएम एक ऐसे चेहरा की तलाश में थे जिसे गुजरात में परखा न गया हो और जो विजय रुपानी सरकार की एंटी-इनकम्बैंसी को कम कर सके। तभी गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री और यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन के निकट सहयोगी भूपेंद्र पटेल पर मोदी की निगाह गयी। भूपेंद्र की छवि एक भक्त नेता वाली थी जिन्होंने अपनी सहजता के चलते आंनदीबेन के आलोचक अमित शाह को भी प्रभावित कर लिया था। चूँकि भूपेंद्र का विधान सभा क्षेत्र , अमित शाह की संसदीय सीट गांधीनगर में ही आता था इसलिए भूपेंद्र ने अपने सांसद के नज़दीक आने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सूत्रों के मुताबिक मोदी के पास ये फीडबैक था कि भूपेंद्र पटेल के नाम पर अमित शाह ऐतराज़ नहीं करेंगे। 

 

 

तीन पॉवर सेंटर में बंट गया गुजरात, चुनाव की राह नहीं आसान  

 

 

अहमदाबाद के एक वरिष्ठ टीवी पत्रकार ने देश 24x7 को बताया कि  भूपेंद्र पटेल के नाम पर अमित शाह तैयार तो हो गए हैं लेकिन शाह जानते है कि आने वाले समय में अब गांधीनगर में आनंदीबेन और उनकी बेटी अनार पटेल का प्रभाव बढ़ेगा। शाह के अलावा प्रदेश अध्यक्ष सी आर पाटिल ने भी भूपेंद्र पटेल की ताजपोशी तो स्वीकार कर ली लेकिन उनकी मुख्यमंत्री बनने की अपनी महत्वाकांक्षाएं को धक्का लगा है। ऐसी स्थिति में पाटिल, मन से कितने कदम पटेल के साथ चलेंगे इसका अनुमान लगाना कठिन है। डिप्टी सी एम  नितिन पटेल और पुराने कैबिनेट मंत्री भी भूपेंद्र पटेल जैसे नये नवेले नेता के सीएम बनने से खुश नहीं हैं। जानकारों का कहना है कि आनंदीबेन, शाह और पाटिल से जुड़े नेता अब धीरे धीरे गुजरात में तीन पावर सेंटर का प्रतिनिधत्व करने पर मज़बूर होंगे क्यूंकि गुजरात भाजपा में पहले से ही वफादारियां बंटी हुई है। कुलमिलाकर परेशानी सबसे ज्यादा मोदी के लिए बढ़ सकती है क्यूंकि 2024 लड़ने से पहले मोदी गुजरात को किसी कीमत पर अब खोना नहीं चाहते हैं। 

ज़ाहिर है अगर यूपी की जीत मोदी को संख्याबल का हौसला देती है तो अपने गढ़ गुजरात को फिर से पा लेना उनकी साख का सबसे बड़ा प्रतीक है।     

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