सबनीस बोले, देश की अर्थव्यवस्था संक्रमण के दौर में, वर्तमान स्थिति स्वाभाविक

मुद्रा कोष की प्रतिक्रिया के विषय में उन्होंने कहा कि प्रचलित प्रक्रिया के अनुसार यह ठीक हो सकता है, लेकिन उन्होने सरकार की कार्पोरेट और पर्यावरण संबंधी नीतियों को इसके लिए जिम्मेदार बताया है।

सबनीस बोले, देश की अर्थव्यवस्था संक्रमण के दौर में, वर्तमान स्थिति स्वाभाविक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े आर्थिक संगठन अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के राष्ट्रीय संगठन मंत्री दिनकर सबनीस ने कहा कि यह ठीक है कि अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने वित्तीय वर्ष 2019-20 में आर्थिक विकास की दर के आंकड़ों में सुधार कर कम किये हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि देश की अर्थव्यवस्था अपने चिंताजनक दौर से गुजर रही है। वह आगे बोले, यह सही है कि विश्व में अर्थव्यवस्था की प्रचलित वर्तमान गणना, इसी तरह की जाती है और उसके अनुसार यह ठीक हो सकता है, लेकिन वास्तविकता में देश की अर्थव्यवस्था अपने संक्रमण दौर से गुजर रही है, इन स्थितियों में यह स्वाभाविक है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। दिनकर भारत के आर्थिक विकास पर IMF द्वारा जारी रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया दे रहे थे।

 

उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान अर्थव्यवस्था में आंकड़े जो कुछ भी दिखाते हैं, वह समाज के बीच धरातल पर दिखाई नहीं देता। आर्थिक विकास की दर औसत आधारित है यह पूरे समाज की वास्तविक आर्थिक स्थिति को नहीं दर्शाती है। मुद्रा कोष की प्रतिक्रिया के विषय में उन्होंने कहा कि प्रचलित प्रक्रिया के अनुसार यह ठीक हो सकता है, लेकिन उन्होने सरकार की कार्पोरेट और पर्यावरण संबंधी नीतियों को इसके लिए जिम्मेदार बताया है। क्या हम सिर्फ कारपोरेट का विचार कर समाज की आर्थिक विसंगतियों को प्रश्रय नहीं देंगे और क्या सिर्फ कार्पोरेट के सहारे देश को बेरोजगारी से बचा पायेंगे।

 

सबनीस ने आश्चर्य व्यक्त किया कि मुद्रा कोष एमएसएमई क्षेत्र के बारे में कुछ नहीं बोला, जो देश को बड़ी संख्या में रोजगार उपलब्ध कराता है। देश के संदर्भ में यह इतना महत्वपूर्ण है कि सरकार को इसके विकास के लिए नया मंत्रालय बनाना पड़ा। वर्तमान में यह क्षेत्र देश के कुल निर्यात का 50 प्रतिशत कर रहा है। अगर हमें समाज की आर्थिक स्थिति सुधारनी है, तो लीक से थोड़ा बहुत हटना भी पड़ेगा और इस तरह के वातावरण को भी झेलना पड़ेगा।

 

विदित हो कि अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने गुरूवार को कहा कि भारत में आर्थिक विकास की दर आवश्यकता से काफी धीमी है। उसने इसके लिए कारपोरेट और पर्यावरण नियामकों की अनिश्चितता के साथ कुछ गैर-बैंक वित्तीय कंपनियों की कमजोर नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है।

 

IMF ने आगे कहा, फिर से हमारे सामने नये आंकड़े होंगे, लेकिन भारत का वर्तमान आर्थिक विकास अपेक्षा से बहुत अधिक धीमा है। इसका प्रमुख कारण कारपोरेट और पर्यावरण संबंधी नीतियों में अनिश्चितता है। कुछ गैर-बैंक वित्तीय कंपनियों की लचर नीतियां भी इसका एक कारण हैं, जिसकी वजह से विकास फिसल रहा है, आईएमएफ के प्रवक्ता गैरी राइस ने प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों से कहा।

 

आर्थिक विकास की दर पिछले सात वर्षों में अपने न्यूनतम 5 प्रतिशत पर अप्रैल से जून वाली तिमाही में है, यही विकास दर सरकारी आंकड़ों के अनुसार एक वर्ष पहले 8 प्रतिशत थी।

 

अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत के संबंध में आर्थिक विकास दर संशोधित कर 0.3 प्रतिशत कम की है। अब उसका अनुमान है कि 2019-20 वित्तीय वर्ष में यह 7 प्रतिशत रहेगी। इसका कारण घरेलू मांग में अपेक्षा से अधिक कमजोरी है।

 

इसी तरह वित्तीय वर्ष 21 की आर्थिक विकास दर को भी पहले प्रकाशित रिपोर्टों में अनुमानित 7.5 प्रतिशत से घटाकर 7.2 प्रतिशत किया गया है।

 

इस मन्दी का बड़ा कारण निर्माण और कृषि क्षेत्र के उत्पादन में भारी गिरावट को माना गया है, सांख्यिकी और कार्यक्रम अनुपालन मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है।

 

इसके पूर्व 2012-13 में अप्रैल से जून की तिमाही में सबसे कम आर्थिक विकास दर 4.9 प्रतिशत दर्ज की गई थी। वैश्विक व्यापार में तनाव, व्यापार भावना में कमजोरी के साथ ही निजी निवेश और ग्राहकों की मांग में कमजोरी भी इसका कारण है।

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