जेट एयरवेज के डूबने से जुड़ी हर वो जानकारी जो आप पढ़ना चाहेंगे

देश 24x7 ने जेट एयरवेज के आला अधिकारियों और एयरलाइन इण्‍डस्‍ट्री के जानकारों से बात करके जाना कि कैसे जेट एयरवेज को सुनियोजित तरीके से आसमान से पाताल में लाया गया

जेट एयरवेज के डूबने से जुड़ी हर वो जानकारी जो आप पढ़ना चाहेंगे

अंतरराष्‍ट्रीय और घरेलू उड़ानों में देश की सबसे बड़ी एयरलाइन कंपनी में शामिल जेट एयरवेज यूंही नहीं अचानक एक दिन में रनवे से उतर गई, बल्कि उसे उतारने की साजिश तो कई सालों से चल रही थी. कमाल की बात ये है कि ये साजिश  और कोई नहीं बल्कि इसके मालिक नरेश गोयल खुद रच रहे थे. जेट एयरवेज पर 26 बैंकों का 8500 करोड़ रूपए कर्ज होने के बाद भी इसके मालिक ने ऐसी रणनीति बनाई कि यदि हर गड़बड़ी की परतें खुल भी जाएं तो उन पर आंच नहीं आएगी.   

 

पहले एयरलाइन कंपनी के गणित को समझें

एयरलाइन इण्‍डस्‍ट्री के नफे-नुकसान के गणित को आसान भाषा में समझते हैं। एयरलाइन की 80 से 85 फीसदी सीटें भरी हों और सारी उड़ानें समय पर संचालित हों तो एयरलाइन फायदे में रहती है। वरना सीटें कम भरें तो रेवेन्‍यू कम आएगा और प्‍लेन जितने देर हवा में चक्‍कर लगाकर फ्यूल बर्बाद करेगा, उतना ही नुकसान होगा। इस तरह से देखें तो एयरलाइन कंपनी के पास खर्चे कम करने के दो मोटे विकल्‍प होते हैं, एक तो फ्यूल कॉस्‍ट कम करे या फिर नॉन- फ्यूल कॉस्‍ट कम करे। नॉन फ्यूल कॉस्‍ट से मतलब स्‍टॉफ सैलरी, इंश्‍योरेंस, एयरपोर्ट चार्ज, सेलिंग कॉस्‍ट, एम्‍प्‍लॉई वेलफेयर कॉस्‍ट आदि में कमी करना. फ्यूल कॉस्‍ट कम करना एक हद तक संभव हो पाता है, जैसे विमानों की अच्‍छी मेंटनेंस करना, अतिरिक्‍त वजन न ले जाना. वहीं नॉन फ्यूल कॉस्‍ट कम करना पूरी तरह मैनेजमेंट के हाथ में होता है.

अब इस गणित को जेट एयरवेज पर लगाएं तो ये कंपनी फायदे की कंपनी थी, इसके पास पीक टाइम की उड़ानें थीं, पैसेंजर्स से भरे विमान थे और एफिशिएंट पायलट्स और इंजीनियर थे, जो फ्यूल की बर्बादी को रोकने के लिए योग्‍य थे. फिर भी ये कंपनी घाटे में गई. क्‍यों ?

 

परेशानी 2008 के आसपास शुरू हुई  

एक दशक पहले लेमैन ब्रदर्स के दिवालिया होने के बाद आई मंदी के समय से ही जेट की हालत खराब होने लगी थी, बाकी बची हुई कसर खुद इसके मालिक नरेश गोयल ने पूरी कर दी. मंदी के कारण बिजनेस क्‍लास में ट्रैवल करने वाले लोगों की संख्‍या लगातार कम होने लगी थी. यात्रियों ने सस्‍ती टिकटें देने वाली एयरलाइन कंपनियों को तवज्‍जो दी. इतना सब होने के बाद भी जेट एयरवेज ने कॉस्‍ट कम करने के लिए कुछ खास कदम नहीं उठाए. बल्कि फ्यूल और नॉन फ्यूल कॉस्‍ट बढ़ाने पर काम किया.

 

क्‍या किया नरेश गोयल ने

जेट एयरवेज के मालिक ने दुनिया के कई देशों में ढेरों शेल कंपनियां बनाईं और उनमें से ज्‍यादातर का इस्‍तेमाल दलाली के लिए किया. यानि कि एयरलाइन की हर एक जरूरत को पूरा करने के लिए इन शेल कंपनियों को कॉन्‍ट्रेक्‍ट दिए और हर सामान, सेवा असल दामों से कई गुना दामों में अपनी ही शेल कंपनी के जरिए खरिदवाई. इस खरीद-फरोख्‍त में कमाया गया मुनाफा उनकी ही शेल कंपनियों को मिला और वो सीधे गोयल की जेब में गया.  यानि कि कंपनी के प्रॉफिट और लॉस की ऐसी बायपास सर्जरी की जिसका सारा मुनाफा गोयल के हिस्‍से में और सारा घाटा जेट एयरवेज के हिस्‍से में.  

शेल कंपनियां भी ऐसे देशों में जाकर ऐसे नामों पर बनाईं कि जिनके मालिकों को ढूंढना ही आसानी से संभव न हो पाए और यदि ढूंढ भी लो तो उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते.

उदाहरण के लिए फ्यूल की ही बात करें तो आम वाहनों के लिए फ्यूल खरीदते वक्‍त बहुत चॉइस नहीं रहती और लगभग सभी कंपनियों के दाम भी एक जैसे ही होते हैं. लेकिन विमानों के मामले में ऐसा नहीं होता, एयरलाइन कंपनियां जिस देश में जिस वेंडर से चाहें फ्यूल ले सकते हैं. ऐसे में फ्यूल की कीमतों में काफी फर्क देखने को मिलता है और हर कंपनी सस्‍ता फ्यूल लेने को प्राथमिकता देती है लेकिन एसबीआई से जुड़े सूत्र बताते हैं कि जेट एयरवेज ने सवा से डेढ़ गुना कीमतों पर  फ्यूल खरीदा. बीच का ये पैसा उसकी शेल कंपनियों को गया.

 

हजारों करोड़ की संपत्ति का मालिक लेकिन स्‍मार्टफोन नहीं था

नरेश गोयल को करीब से जानने वाले लोग बताते हैं कि वो खुद को लॉर्जर दैन लाइफ की छवि में देखना और रखना पसंद करते हैं. इस कारण हर चीज को वो खुद कंट्रेाल करना चाहते हैं और एक अच्‍छे बनिया की तरह उन्‍होंने बिजनेस के फायनेंस पर पूरा कंट्रोल रखा.  हमेशा सीईओ और सीएफओ के पद पर ऐसे लोगों को रखा, जो आंख मूंदकर गोयल की बात मान लें. विजय माल्‍या, नीरव मोदी की गल्तियों से सीख ली और ऐसी रणनीति बनाई कि देश की सारी जांच एजेंसियां भी जुट पाएं तो भी नरेश गोयल को आरोपी सिद्ध नहीं कर सकतीं.

 

वो हमेशा एक ऐसे चेयरमेन रहे, जो कभी किसी एक्जिक्‍यूटिव पोस्‍ट पर नहीं रहे, वो केवल चेयरमेन रहे. उन्‍होंने केवल लोग अपॉइंट किए और हर अच्‍छा-बुरा काम उनसे ही करवाया. उनके ऑफिस  में उनका कमरा किसी लेविश घर के लिविंग रूम जैसा था. उसमें न ऑफिस टेबल थी, न लेपटॉप था, बल्कि उनके पास तो स्‍मार्टफोन भी नहीं था. दो साल पहले तक नोकिया का की-पैड वाला फोन इस्‍तेमाल करते थे. ना कभी किसी दस्‍तावेज पर साइन किए. उनके साइन केवल जेट एयरवेज की उस मैगजीन में मिलेंगे जो पैसेंजर के लिए निकाली जाती थी.

 

दस्‍तावेजों, फाइलों पर गोयल की बजाय अधिकारियों हस्‍ताक्षर होने के कारण यदि किसी अनियमितता का आरोप लगने की बारी आएगी तो सीईओ, सीएफओ की गर्दन पर ही तलवार पड़ेगी क्‍योंकि खुद गोयल ने तो कभी कहीं दस्‍तखत किए ही नहीं. इस तरह उन्‍होंने ऐसा जाल फैलाया कि एयरलाइन को नुकसान में गले तक डुबाने के बाद भी उन पर एक आरोप भी सिद्ध न किया जा सके.

 

बोर्ड ऐसा कि बस, सांस लेता रहे और कुछ कर भी न पाए

देश ही नहीं दुनिया की एयरलाइन इण्‍डस्‍ट्री में से जेट ऐयरवेज उन चुनिंदा एयसरलाइन कंपनी में से एक है, जिसका कई साल से मार्केट में शेयर नहीं जारी किए गए. गोयल अकेले 51 फीसदी शेयर के मालिक रहे और पूरा बोर्ड उनके कब्‍जे में रहा. इससे ना तो वो शेयरधारकों के लिए उत्‍तरदायी रहे न सरकार या देश की जनता के लिए क्‍येांकि ये पैसा टैक्‍सपेयर्स का तो था नहीं. ये तो वो पैसा था जो पैसेंजर आरामदायक यात्रा करने के लिए जेट एयरवेज को देते थे और इसके बदले जेट एयरवेज उनकी उम्‍मीदों पर खरी उतरती थी.

 

जबकि दुनिया की टॉप एयरलाइंस को देखें तो शायद ही कोई एयरलाइन ऐसी होगी जिसका 30 फीसदी से ज्‍यादा हिस्‍सा भी किसी एक व्‍यक्ति के पास हो. लुफतांसा तो ऐसी एयरलाइन है जिसका तो कोई मालिक ही नहीं है.  डेल्‍टा, ब्रिटिश एयरवेज भी अपने शेयरहोल्‍डर्स के लिए उत्‍त्‍रदायी हैं.  

 

भ्रष्‍टाचार की सीमा ऐसी कि सरकारी विभाग भी शरमा जाएं

 

जेट एयरवेज में ऊंचे पद पर रहे एक अधिकारी ने एक किस्‍सा सुनाया कि जेट एयरवेज में आए विदेशी पायलटों के लिए वेकेंसी निकली. कई विदेशी पायलट्स ने नौकरी के लिए अप्‍लाई किया और कई महीनों तक इंतजार किया लेकिन कोई रिप्‍लाई मेल तक नहीं आया लेकिन जैसे ही अपॉइंटमेंट में दलाली करने वाली शेल कंपनी के जरिए अप्‍लाई किया तो 7 दिन में अपॉइंटमेंट हो गया.

 

ऐसी कई मनमानियों से जेट एयरवेज की हालत दिन-ब-दिन खराब होती गई. नुकसान की भरपाई करने के लिए लोन लेने शुरू किए गए. फिर इसमें भी करप्‍शन शुरू हुआ. बैंकर और कर्ज मांगने वाले के बीच कमीशन फिक्‍स हुए और लोन पर लोन लिए गए. कंपनी का फायनेंशियल स्‍ट्रक्‍चर बहुत बुरी हालत में पहुंच गया.  

 

यूपीए और एनडीए सरकार का रोल

यूपीए सरकार के समय में एयरलाइन इण्‍डस्‍ट्री के लिए इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर भी बहुत बढ़ा और इस इण्‍डस्‍ट्री का कारोबार भी खूब बढ़ा. सरकार की नीतियों के कारण नई कंपनियां भी बाजार में आईं और कम से कम किराए पर यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देने के लिए इनमें अच्‍छा कॉम्‍पटीशन भी हुआ. जेट एयरवेज के मालिक ने यूपीए सरकार और तात्‍कालीन उड्डयन मंत्री से अच्‍छी सांठ-गांठ कर पीक टाइम की उड़ानें जेट एयरवेज को दिलाईं. खैर, जितनी उड़ानें और पैसेंजर्स बढ़े, घाटा भी उसी अनुपात में बढ़ता गया. वहीं एनडीए सरकार ने सीटें बढ़ाने के लिए कोई काम नहीं किया. एविएशन इण्‍डस्‍ट्री के लिहाज से इस सरकार का परफॉर्मेंस खराब रहा.

 

अब क्‍या होगा आगे

जिस कंपनी के डूबने से 20 हजार लोगों की नौकरी संकट में आ गई. उसका अब क्‍या होगा? ये सवाल सभी के जेहन में है.  19 तारीख को आचार संहिता हटने के बाद सरकार चाहे तो इस बारे में निर्णय ले सकती है. क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अब ये मामला बैंकों से हटाकर सरकार के हाथ में दे दिया है. हालांकि, ऐसी उम्‍मीद न के बराबर ही है क्‍योंकि 4 दिन के बचे हुए कार्यकाल में मौजूदा सरकार के पास करने के लिए और भी दूसरे कई अहम काम होंगे. ऐसे में आने वाली नई सरकार ही इस पर कुछ फैसला लेगी और वो ऐसा जल्‍द से जल्‍द करना चाहेगी क्‍योंकि इस एयरलाइन के बंद होने से जीडीपी को बहुत नुकसान हो रहा है.

 

जेट एयरवेज का टर्नओवर करीब 3 बिलियन डॉलर का था. एविएशन कंपनी के टर्नओवर का 6 गुना असर जीडीपी पर आता है क्‍योंकि एविएशन से मतलब हवाई यात्रा करना नहीं है. इसमें एयरपोर्ट चार्ज, फूड, ग्राउंड स्‍टॉफ, हॉस्पिटेलिटी, पार्किंग चार्ज, टूरिज्‍म जैसे कई क्षेत्र उनसे मिलने वाले रोजगार और रेवेन्‍यू भी शामिल होता है. जाहिर है, देश की सबसे बड़ी और कॉम्‍पीटेंट एयरलाइन का बंद होना और उससे जीडीपी को होने वाले नुकसान को सरकार ज्‍यादा दिन नहीं झेल पाएगी.

 

तो कौन खरीदेगा जेट को

इसके एम्‍प्‍लॉई एसोसिएशन ने तो इसके लिए ऑफर दे ही दिया है और भी कुछ ऑफर ऐसे हो सकते हैं. लेकिन बेहतर होगा कि इसे कोई ऐसी कंपनी खरीदे जो इस पर एकछत्र आधिपत्‍य न चाहे, ताकि जो मनमर्जी नरेश गोयल ने चलाई, वैसी कोई और न चला सके. ज्‍यादा से ज्‍यादा शेयरहोल्‍डर्स हों, इससे बोर्ड शेयरहोल्‍डर्स के सामने जबावदेह हों.

 

बता दें कि जेट एयरलाइंस के कर्मचारियों के प्रतिनिधियों ने कहा है कि वे बाहरी निवेशकों से जेट के लिए 3000 करोड़ के निवेश की व्यवस्था कर सकते हैं. कर्मचारियों के संगठन ने अपना यह प्रस्ताव वेलफेयर ऑफ इंडियन पायलट्स (SWIP) और जेट एयरक्राफ्ट मेंटनेंस इंजीनियर्स वेलफेयर एसोसिएशन (JAMEWA) को भी भेजा है. संगठन ने कहा है कि कर्मचारी एयरलाइंस से होने वाली कमाई को इसी में लगाएंगे. वे इसकी प्रोडक्टिविटी बढ़ाने पर ध्यान लगाएंगे. चिट्ठी में लिखा गया है एयरलाइंस के साथ कई समस्याएं हैं. इसमें ऊंची ऑपरेटिंग लागत, जरूरत से ज्यादा कर्मचारी जैसे मुद्दे शामिल हैं, जिन्‍हें वो दूर करेंगे.

 

इस प्रतिनिध मंडल के सदस्‍य और जेटलाइट के फ्लाइट ऑपरेशंस के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट कैप्‍टन पीपी सिंह कहते हैं कि जेट एयरवेज के केवल फायनेंशियल स्‍ट्रक्‍चर में समस्‍या आई है और जिसे सरकार या किसी अन्‍य इन्‍वेस्‍टर की मदद से दूर किया जा सकता है. इस बात को छोड़ दें तो सुरक्षा, कस्‍टमर सर्विस, परफॉर्मेंस, पंचु‍अलिटी, स्‍टॉफ, अच्‍छी उड़ानें जैसी हर चीज में जेट एयरेवज शानदार है और यदि मेरे पास पैसे हों तो मैं तुरंत इसे खरीदना चाहूंगा.

 

 

 

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