सूरत में हीरे से हीरा भी कट रहा है और मज़दूर भी

जिस हीरा उद्योग में मेहुल चौकसी से लेकर ढोलकिया तक खरबपति बने उस उद्योग में मज़दूरों को काम की कीमत तक नहीं मिल रही, बड़ी संख्या में वर्कर्स का गुजरात से पलायन

सूरत में हीरे से हीरा भी कट रहा है और मज़दूर भी
दीपक शर्मा
दीपक शर्मा

September 14,2021 12:47

ये सही है कि हीरे से हीरा कटता है पर गुजरात में खरबों रुपये की 'डॉयमण्ड इंडस्ट्री' में हीरे से हीरे का मज़दूर भी कट रहा है। सरकार से प्रशय पाए रसूखदार हीरा उद्योगपति जहाँ एक्सपोर्ट के जरिये भारी मुनाफा कमा रहे हैं वहीँ वर्कर्स को उनकी मज़दूरी की सही कीमत तक अदा नहीं कर रहे है। राज्य में मज़दूरों के शोषण का हाल ये है कि इस साल 8.52  बिलियन डॉलर के हीरे निर्यात करने के बावजूद, गुजरात में 20 फीसदी मज़दूरों ने कारखानों से पलायन किया है। 

 

 

ज़रुरत से ज्यादा काम और ज़रुरत से कम तनखा के मज़दूर विरोधी कृत्य पर डायमंड वर्कर्स यूनियन(DWU) के अध्यक्ष रमेश भाई जिलरिया ने बताया कि हीरा व्यापारियों  की मज़बूत लॉबी के रहते मज़दूरों की गुजरात में सुनवाई नहीं है। 'हमने तीन बार मुख्यमंत्री (विजय रुपानी) से मिलने का आग्रह किया था लेकिन हमे समय नहीं दिया गया। हमने प्रधानमंत्री को पत्र लिखे पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। वैसे भी पीएम मोदी जब यहाँ आकर सबसे बड़े व्यापारी(सावजी ढोलकिया) की फ़ैक्टरी का उदघाटन करेंगे, तो हमारी भला कौन सुनेगा ? ' रमेश जिलरिया ने देश 24x7 से कहा।

 

 

ताकतवर डायमंड लॉबी किस तरह करती है मज़दूरी का शोषण 

 

 

भले ही ज़बरदस्त मुनाफे ने मेहुल चौकसी या नीरव मोदी जैसे खरबपति हीरा उद्योगपतियों को धनकुबेर बना दिया हो पर इस उद्योग की ज़मीनी हकीकत कुछ और है। ब्रिटिश साम्राज्य से कहीं अधिक यहाँ मज़दूरों का आज भी शोषण होता है। लेबर कानून ताक पर रख कर ,बहुत सी बड़ी कंपनियां भी अपने वर्कर्स को प्रोविडेंट फण्ड और ग्रैच्युटी नहीं देती। लेबर कोर्ट में ऐसे मामलों की ढंग से सुनवाई नहीं होती। DWU के अध्यक्ष रमेश भाई बताते हैं कि दस-बारह साल से सूरत के कारखानों में काम करने वाले डायमंड वर्कर्स के वेतन में बढ़ोतरी नहीं हुई। ' हमारे वर्कर्स को दस साल पहले भी 12 से 15 हज़ार रुपये मासिक मिलते थे। आज भी इतने ही पैसे मिल रहे हैं। इन 10-12 साल में डायमंड इंडस्ट्री कहाँ से कहाँ पहुंच गयी, मालिकों की दौलत कई गुना बढ़ गयी... पर वर्कर के वेतन में एक रुपया नहीं बढ़ा है ? क्या इसे शोषण नहीं कहा जायेगा ?' रमेश भाई ने सवाल किया। 

 

 

ऐसा कहा जाता है कि ज्यादातर डायमंड व्यापारी और एक्सपोर्टर्स के सत्ता पक्ष से गहरे रिश्ते हैं। पैसे के दम पर ही नौकरशाही भी उनके आगे झुकी रहती है। मुख्यधारा की मीडिया भी डायमंड इंडस्ट्री में हो रहे शोषण की खबर सामने नहीं लाती है। ' देश ने देखा है कि किस तरह नीरव मोदी और मेहुल चौकसी हज़ारों करोड़ का बैंक घोटाला करने के बाद भी आसानी से फरार हो गए। आखिर सत्ता और नौकरशाहों की मदद के बगैर ये कैसे मुमकिन है ? ये लॉबी बहुत ताकतवर है और हम लोग बहुत कमज़ोर ..इसलिए हमे अपना हक़ नहीं मिलता। इसीलिए हमें, हमारी मेहनत की मुनासिब कीमत नहीं मिलती ,' ढोलकिया के कारखाने में काम कर रहे एक वर्कर ने बताया।  

 

 

क्यों गुजरात छोड़ रहे हैं डायमंड वर्कर ?  

 

 

55 हज़ार से ज्यादा मज़दूरों के साथ जुड़े डायमंड वर्कर्स यूनियन का कहना है कि कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन में मज़दूरों की हालत बेहद ख़राब हुई।अधिकांश मज़दूरों को इस दौरान एक भी पैसा नहीं मिला। लिहाजा बड़ी संख्या में मज़दूर यहाँ से चले गए। पर लॉक डाउन खत्म होने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि गुजरात से बाहर के मज़दूर खरीफ की बुआई के बाद गाँव से लौटकर आएंगे।' पर कोई लौट के आना नहीं चाहता है।आज सूरत में डेढ़ लाख से ज्यादा मज़दूरों की कमी है। डायमंड इंडस्ट्री में काम काफी है लेकिन मज़दूर नहीं मिल रहे। अगर पैसे और सुविधाएँ बढ़े तो क्यों नहीं मज़दूर लौटेंगे ,' रमेश भाई ने कहा। 

 

 

बहरहाल मज़दूर हित के लिए संघर्ष कर रहे रमेश का कहना है कि वे जल्द गुजरात के नए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल से मिलकर अपनी मज़बूरियां बताएयेंगे। 'भूपेंद्र नए तरह के नेता लगते हैं, शायद वो हमारी बात सुनें, और कोई रास्ता निकालें  ,' डायमंड वर्कर्स के नेता रमेश भाई ने उम्मीद जताई। उधर, जेम एंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट काउंसिल, गुजरात के क्षेत्रीय अध्यक्ष दिनेश नवादिया ने मिडिया से कहा कि स्किल्ड और अनस्किल्ड वर्कर के भुगतान में अंतर होने के कारण कई तरह की समस्याएँ होती हैं।'आम तौर पर,  स्किल्ड वर्कर को प्रति पीस के हिसाब से भुगतान किया जाता है, जबकि आम वर्कर को मासिक वेतन दिया जाता है। इसे लेकर दिक्कतें होती है, ' दिनेश नवदिया ने कहा। उनका सुझाव था कि किसी कारखाने में वर्कर्स के वेतन के संबंध में कोई समस्या है, तो मालिक और मज़दूरों को एक साथ बैठकर  इस समस्या का समाधान करना चाहिए। 

          

                   

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