मदर इंडिया के दौर में सत्‍यम शिवम सुंदरम जैसी हॉट फिल्‍म बनाना चाहते थे राज कपूर

1951 में राज कपूर ने कुछ ऐसे आपत्तिजनक दृश्‍य अपनी फिल्‍म ‘आग’ में गढ़े कि सेंसर बोर्ड को कैंची चलानी पड़ गई थी 

मदर इंडिया के दौर में सत्‍यम शिवम सुंदरम जैसी हॉट फिल्‍म बनाना चाहते थे राज कपूर

जरा कल्‍पना कीजिए जिस दौर में हीरोइन के पल्‍लू का हवा में उड़ना भी रोमांटिक सीन की पराकाष्‍ठा मान लिया जाता हो, उस दौर में हॉट फिल्‍में बनाने की बात सोचना भी बेमानी लगता होगा। लेकिन यदि आप भी ऐसा सोच रहे हैं तो आप गलत हैं क्‍योंकि उस वक्‍त भी ऐसे निर्माता-निर्देशक थे जो हॉट फिल्‍में बनाना चाहते थे। इसमें से एक नाम तो राज कपूर साहब का ही है, जिन्‍होंने 50 के दशक की शुरूआत में इसके लिए कोशिश भी की। उन्‍होंने ऐसे गरमा-गरम सीन शूट भी कराए लेकिन वो बात अलग है कि ये सीन फिल्‍मों में नजर नहीं आए।  

 

उन्‍होंने अपनी फिल्‍म ‘आग’ में कई ऐसे दृश्‍य डाले थे, जो उस वक्‍त विवाद कराने के लिए काफी थे। मसलन एक दृश्‍य जिसमें हीरोइन, हीरो के सीने पर सिर रखकर आराम कर रही है, उस वक्‍त उन दोंनों के हावभाव (जिसे आज की भाषा में हीरो-हीरोइन की सिजलिंग केमेस्ट्रिी कह सकते हैं) या कॉलेज के क्‍लासरूम में राज कपूर के अपने दोस्‍तों के साथ आने और उस समय की बातचीत के कुछ दृश्‍य आदि। जाहिर है, ये दृश्‍य फिल्‍मों में नहीं थे क्‍योंकि सेंसर बोर्ड ने इन्‍हें हटवा दिया था।

 

ऐसे मिली ये जानकारियां

अब आपके जेहन में ये सवाल आ रहा होगा कि जब ये सीन फिल्‍म में नहीं थे तो अब ऐसे दृश्‍यों के बारे में कैसे पता चला? दरसअल, भारतीय सिनेमा के पुराने दौर के प्रशंसक और उसके बारे में जानने-सुनने-देखने के जिज्ञासु लोगों के लिए एक नया पिटारा पुणे के नेशनल फिल्‍म आर्काइव ऑफ इंडिया ने खोल दिया है। कमाल की बात ये है कि इसे देखने के लिए आपको पुणे स्थित इंस्‍टीट्यूट में जाने की जरूरत नहीं है, बल्कि इन्‍हें आप घर बैठे ऑनलाइन देख सकते हैं।

 

हाल ही में एनएफएआई ने भारतीय सिनेमा के शुरुआती दिनों में फिल्म निर्माताओं को जारी हुए सेंसर बोर्ड के आदेशों के डिजीटल रिकॉर्ड पहली बार सार्वजनिक डोमेन में लाए हैं। इन रिकॉर्डस को 'फिल्म सेंसर रिकॉर्ड्स' नाम के एक सेक्शन के तहत पोस्ट किया गया है, जो कि 2,500 पृष्ठों की फिल्म फाइलों के विशाल संग्रह का हिस्सा है, जिसे नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया (एनएफएआई), पुणे ने डिजिटलीकृत किया है और अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध कराया है।

 

 

इसी में उल्‍लेख है कि 4 जनवरी, 1951 को सेंसर बोर्ड ने आग फिल्‍म के निर्माताओं और राज कपूर के निर्देशन में बनी इस पहली फिल्‍म में से कई दृश्‍य काटने के लिए निर्देश दिए। इसके लिए इन दृश्‍यों का विस्‍तार से वर्णन भी किया गया। तब जाकर इस फिल्‍म को ’U 'प्रमाणपत्र दिया गया था।

 

6 हिस्‍सों में बांटा है रिकॉर्डस को

सेंसर बोर्ड के इन निर्देशों को अलग-अलग छह खंडों में बांटा गया है। जिनमें प्रत्येक फिल्म से जुड़ी कई जानकारियां शामिल हैं जैसे- नाम, रीलों की संख्या, लंबाई, जिन्होंने प्रमाणन के लिए आवेदन किया, जिन्होंने इसे बनाया या जारी किया, मूल देश, परीक्षा की तारीख, और प्रमाणीकरण की संख्या और तारीख। वैसे इन रिकॉड्स का डिजिटलीकरण 2009-10 में किया गया था, लेकिन उन्‍हें केवल NFAI की लाइब्रेरी में जाकर ही देखा जा सकता था, अब इन्‍हें ऑनलाइन उपलब्‍ध कराया गया है। इन रिकॉर्ड के मुताबिक स्वतंत्रता से पहले सर्टिफिकेशन के लिए आने वाली फिल्‍मों अधिकांश फिल्में विदेशों से थीं, जिनमें ज्‍यादातर फिल्‍में यूएस और यूके की थीं।

 

NFAI के निदेशक प्रकाश मगदुम कहते हैं कि “ये रिकॉर्ड प्रारंभिक भारतीय सिनेमा और भारतीय फिल्म उद्योग के ऐतिहासिक दस्तावेज हैं जो इस संस्‍थान ने सहेज कर रखे थे और अब जनता के लिए उपलब्ध हैं। यह डेटाबेस उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी होगा जो प्रारंभिक भारतीय सिनेमा का अध्ययन करने में रुचि रखते हैं। ”

 

द्वितीय विश्‍वयुद्ध में सख्‍त थी जांच

रिकॉर्ड यह भी बताते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान युद्ध फिल्में जांच के दायरे में थीं। कोलंबिया फिल्म्स ऑफ इंडिया की फिल्‍म ‘ आई विल नेवर हैल अगेन’ को मार्च 1942 में सर्टिफिकेशन नहीं दिया गया क्‍योंकि माना गया कि यह फिल्‍म युद्ध को लेकर बुरा प्रचार करती है। इसी तरह 23 जुलाई, 1942 को, सेंसर बोर्ड ने चाइना फाइट्स बैक: मार्च ऑफ़ टाइम, आरकेओ रेडियो पिक्चर्स, इंडिया की एक युद्ध फिल्म में बर्मा रोड का चित्रण करने वाले दृश्यों और डायग्राम को हटाने के लिए कहा।

 

ये आपत्तियां क्षेत्रीय सेंसर बोर्ड द्वारा उठाई गई थीं, जो उस समय के प्रमुख शहरों जैसे कि बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास और लाहौर में पुलिस प्रमुखों के अधीन काम करती थीं। आज, फिल्में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) द्वारा प्रमाणित हैं।  

 

इन दस्‍तावेजों में बोर्ड द्वारा सर्टिफिकेशन जारी किए जाने के बाद उन्‍हें रद्द करने के भी प्रमाण हैं। 8 जून, 1942 को एक मराठी फिल्म किटी हसाल में कुछ कट लगाने के बाद जारी किए गए एक प्रमाण पत्र को बाद में रद्द कर दिया गया।

NFIA national film institute of archive mother india raj kapoor film hot scene