बीस साल के इस युद्ध में आखिर अमेरिका ने कैसे बना दिया पाकिस्तान को विजेता

आस्‍तीन में सांप पाला था अमेरिका ने, तो एक न एक दिन तो डसना ही था, अब अमेरिका का हाल यह है कि न खुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम

बीस साल के इस युद्ध में आखिर अमेरिका ने कैसे बना दिया पाकिस्तान को विजेता
Desh 24X7
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September 11,2021 09:45

खुद को महाशक्ति बताने और मानने वाला अमेरिका हजारों करोड़ रुपये और बड़ी संख्‍या में अमेरिकी सैनिकों की शहादत देने के बाद भी आज लुटा-पिटा सा तालिबान के सामने असहाय दिख रहा है। आज यह दिन आ गया है कि वर्ल्‍ड ट्रेड सेंटर पर जिस 9/11 की घटना होने पर उसके जिम्‍मेदार ओसामा बिन लादेन को पाकिस्‍तान में सुरक्षित छिपे होने के बावजूद अमेरिकी सैनिकों ने घुसकर मारा था। उन्‍हीं आतंकवादियों की आज खुलेआम अफगानिस्‍तान में सरकार बन रही है, और सरकार बनाने वाले नुमाइंदों ने शपथ के लिए वही 9/11 की बरसी का दिन यानी 11 सितम्‍बर का दिन चुना है। दरअसल अमेरिका की इस नाकामयाबी के पीछे जो दिमाग है वह उसी पाकिस्‍तान का है जिसे अमेरिका अपने फायदे के लिए पाल-पोसकर बड़ा करता रहा है।

 

सीधी सी बात है जब आस्‍तीन में सांप पालोगे तो सांप को जीभ निकालने भर की देर है, और आपका काम तमाम। भारत हमेशा से पाकिस्‍तान की आतंकवादी हरकतों के खिलाफ सबूत पर सबूत देता रहा, लेकिन अमेरिका ने भारत की बातों को गंभीरता से नहीं लिया, सिर्फ विरोध की औपचारिकता निभाता रहा, लेकिन अंदर ही अंदर उसे मजबूत करता रहा। अमेरिका 9/11 का बदला लेने की गरज से अफगानिस्‍तान में अपनी सेना को भेजकर 20 साल तालिबान के खिलाफ लड़ता रहा। जबकि अंदर ही अंदर पाकिस्‍तान अमेरिका के साथ घात कर तालिबानी लड़ाकों से अपनी दोस्‍ती निभाता रहा। इसीलिए जब तालिबान का अफगानिस्‍तान पर कब्‍जा हुआ तो जहां अमेरिका के मित्र देश अफसोस जाहिर कर रहे थे, वहीं पाकिस्‍तान खुशी से फूला नहीं समा रहा था।

   मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान का इस आसानी से कब्जा ये संकेत देता है कि अमेरिका, पाकिस्तान को समझने में पूरी तरह से नाकाम रहा है। ऐसा नहीं है कि यह सब अचानक कुछ ही दिनों में हो गया। अफगानिस्तान के पूर्व उप-राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने बहुत पहले ही पाकिस्तान के तालिबन के साथ गठजोड़ पर साफ कहा था कि अफगानिस्‍तान के आम नागरिकों में पाकिस्‍तान के प्रति फैल रही नफरत की मूल वजह तालिबान के लिए उसका समर्थन है।  

 

 

रिपोर्ट्स बताती हैं कि पिछले साल नवंबर 2020 में पूर्व अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने भी तालिबान का समर्थन करने के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने में राष्ट्रपति जो बाइडेन की विफलता का जिक्र किया था।  करजई ने इसके बाद मार्च 2021 में भी अपनी बात को दोहराते हुए कहा था कि बाहरी ताकतों द्वारा अफगानों का एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है। यह भी कहा था कि पाकिस्तान अब तालिबान के माध्यम से अफगानिस्तान में रणनीतिक वर्चस्व हासिल करना चाहता है। यूएस के सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा था कि अफगानिस्तान का युद्ध कुछ हफ्तों में समाप्‍त हो सकता है अगर पाकिस्तान अपने इलाकों में तालिबान को पनाह देने से इनकार कर दे। लेकिन पाकिस्‍तान ने जहां तालिबान को सुरक्षित पनाह देना जारी रखा वहीं तालिबान और आईएस के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए अमेरिका को अपनी जमीन का इस्‍तेमाल करने की इजाजत देने से पाकिस्‍तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने साफ इनकार कर दिया था। यही नहीं इमरान खान ने उल्‍टा अमेरिका को ही कटघरे में खड़ा करते हुए कह दिया था कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में ‘वास्तव में गड़बड़ी कर दी है इसीलिए अमेरिका की अगुवाई वाली नाटो फौज बुरी तरह नाकाम हुई’ यहां तक की इमरान ने यह भी कहा था कि तालिबान को काबुल में एक ‘समावेशी सरकार’ का हिस्सा बनाने की जरूरत है। 

 

 

अमेरिका को धोखा पाकिस्‍तान से ही नहीं बल्कि अफगानिस्तान शांति प्रक्रिया के लिए अमेरिका के विशेष दूत जलमय खलीलज़ाद ने भी दिया, उसने पाकिस्तान पर अमेरिका के भ्रम को और भी बढ़ा दिया। अपने राजनयिक अनुभव का उपयोग करते हुए खलीलज़ाद ने मुल्ला बरादार का समर्थन करने के लिए आक्रामक रूप से पैरवी की। उसने पाकिस्‍तान के इशारे पर इस बात को हवा दी कि बरादर व्‍यावहारिक है और पाकिस्तान के इशारे पर इस विमर्श को हवा दी कि बरादर व्यावहारिक है और एक समझौता चाहता है। उसने उसकी रिहाई के पीछे अमेरिकी कूटनीति का भार रखा और फिर अपनी चालाकी से बरादर को दोहा में एक मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया।भारी भरकम खर्च और मजबूत सेना के बावजूद अगर अफगानिस्‍तान से तालिबान को समाप्‍त करने में अमेरिका नाकाम रहा तो इसकी बड़ी वजह पाकिस्‍तान का तालिबान को दिया खुला समर्थन ही है, पाकिस्‍तान आखिर तालिबान का विरोध कैसे करता, उसने तो तालिबानी लड़ाकों को अपनी सेना से प्रशिक्षण दिलवाया था। जनरल मुशर्रफ ने तो सार्वजनिक टीवी पर कहा था कि पाकिस्तान, तालिबान का अड्डा है और पाक सेना ने ही उसके आतंकवादियों को प्रशिक्षित किया है। पाकिस्‍तान में तालिबानी ठिकाना होने के बारे में अफगान राष्ट्रीय पुलिस के प्रमुख जनरल अब्दुल रज़ीक ने कहा था, 'वे जो भी हैं, हम उनके सामने आत्मसमर्पण नहीं करेंगे. हमारे पास देश की रक्षा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं हैं। वे तालिबान नहीं हैं, वे आतंकवादी हैं. यह हम पर बाहर से थोपी गई जंग है। दुश्मन का मुख्य ठिकाना यहां नहीं, पाकिस्तान में है।'

 

 

मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका ने हजारों करोड़ रुपये अफगानिस्तान में स्वाहा कर दिये। अफगानिस्‍तान में  निवेश में भी अमेरिका ने करोड़ों की रकम खर्च कर दी। अमेरिका के इस खर्च की पुष्टि अमेरिकी सीनेट में रखे गए दस्तावेज भी करते हैं। यही नहीं पाकिस्तानी सीनेटर फैसल आबिदी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि पाकिस्तान हक्कानिया मदरसा को वित्त पोषित कर रहा था जिसे तालिबान का ठिकाना माना जाता है और जहां बेनजीर भुट्टो की हत्या की योजना बनाई गई थी।

 

आज हाल यह है कि पाकिस्‍तान अफगानिस्‍तान के अंदर ऐसे घूम रहा है जैसे कि वह उसका अपना देश हो। तालिबान ने जहां दूसरे देशों की अफगानिस्‍तान में गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा रखा है वहीं पाकिस्‍तान खुले रूप में अफगानिस्‍तान मे घूम रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स बता रही है कि अफगानिस्‍तान में रहने वाले नागरिकों की सहायता के लिए खाने-पीने के सामान और दवाओं की सहायता पाकिस्‍तान कर रहा है, ये सहायता पाकिस्‍तान के विमान लेकर आते हैं, जबकि जिल ठिकानों पर यह सामान आ रहा है वहां से पाकिस्‍तान की दूरी 50 से 100 किलोमीटर की है, यानी जो रास्‍ता सड़क मार्ग सिर्फ 1 से 2 घंटे में तय हो सकता है उसके लिए विमान की घंटों की यात्रा करने के पीछे का मकसद कुछ और ही है, पाकिस्‍तान से विमान में मदद के लिए सामान आता है लेकिन वापसी के समय तो विमान खाली होता है न, लेकिन रिपोर्ट्स बताती है कि विमान में वापसी के समय जाते हैं वे हथियार जो अमेरिकी सैनिक अफगानिस्‍तान में छोड़ गये थे, ये हथियार पाकिस्‍तान की बाजारों में बिक रहे हैं। 

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