भाजपा से टूटकर सपा में जुड़ने से क्या राजभर दिला पाएंगे राज ?

तीन महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर प्रतिद्वंदी एक लाइन में खड़े दिख रहे हैं और सियासी माहौल गर्म होता चला जा रहा है इसकी तस्वीर साफ़ होती जा रही है।

भाजपा से टूटकर सपा में जुड़ने से क्या राजभर दिला पाएंगे राज ?

उत्तरप्रदेश  की 403 विधानसभा सीटों में से 4 सीटों के विजेता सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ अपनी मुलाकात की 20 अक्टूबर को एक फोटो ट्वीट की और तस्वीर को कैप्शन दिया गया था 'अबकी बार, बीजेपी साफ'। इससे उत्तरप्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा हो गई है | हम आपको बता दें राजभर ने कुछ ही दिन पहले अपने पुराने सहयोगी भाजपा के साथ सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत की थी तो सबको अचम्भा हुआ था लेकिन  जब 27 अक्टूबर को मऊ जिले में एसबीएसपी स्थापना दिवस की रैली में अखिलेश मुख्य अतिथि के रूप में आए थे, तब उनके जाने की अटकलों पर विराम लग गया था।

 

उन्होंने कहा, सपा की लाल टोपी और एसबीएसपी की पीली टोपी अब एक हैं। बीजेपी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि अगर पश्चिम बंगाल चुनाव में 'खेला होबे'  था, तो पूर्वांचल के लोग अब कहेंगे  ‘खदेड़ा होबे’ | हम आपको बता दें तीन महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर प्रतिद्वंदी एक लाइन में खड़े दिख रहे हैं और सियासी माहौल गर्म होता चला जा रहा है इसकी तस्वीर साफ़ होती जा रही है।

 

साथियों कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लड़ाई सत्तारूढ़ भाजपा और सपा के बीच हो सकती है, क्यों कि सपा को छोटे-छोटे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का समर्थन मिल रहा है |  एसपी के नेतृत्व वाले इस गठबंधन का एक प्रमुख घटक एसबीएसपी होगा,राजभर एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और उनकी क्षेत्रीय समकक्ष जातियों पर अच्छी पकड़ है इसलिए 153 विधानसभा सीटों पर, काँटे की टक्कर होने वाली है |

 

पूर्वांचल और अवध के 24 जिलों में राजभर की अच्छी खासी मौजूदगी है, इन सीटों पर इनकी संख्या 20,000 से लेकर 90,000 तक है। “एसबीएसपी का न केवल राजभर समाज पर बल्कि बंसी, अर्कवंशी, बिंद, प्रजापति, पाल और विश्वकर्मा जैसी कई पिछड़ी जातियों पर भी प्रभाव है। अगर अखिलेश यादव अपने मुस्लिम-यादव आधार को समर्थन दे सकते हैं, तो सपा-एसबीएसपी गठबंधन पूर्वांचल में भाजपा को चुनौती दे सकता है,

 

 

लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख शशिकांत पांडे कहते हैं कि राजभर की पार्टी ने 2017 में बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन के हिस्से के रूप में यूपी में आठ विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था। योगी आदित्यनाथ कैबिनेट में पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री के रूप में, उन्होंने बार-बार सरकार पर पिछड़े समुदायों की उपेक्षा करने का आरोप लगाया। 2019 के लोकसभा चुनाव में, राजभर ने नाता तोड़ लिया और 39 सीटों पर अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिसमें कोई भी जीत नहीं मिली।

 

 

आदित्यनाथ ने लोकसभा चुनाव के नतीजों के तुरंत बाद राजभर को अपनी टीम से हटा दिया, हालांकि राजभर का दावा है कि उन्होंने खुद ही इस्तीफा दे दिया था अब देखना ये दिलचस्प होगा कि क्या राजभर का भाजपा से टूटकर सपा में जुड़ने से अखिलेश को कितना फायदा मिलता है |

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